क्षमा को बढ़ाना है तो प्रेम का विस्तार करो क्योंकि जिससे प्रेम होता है उसकी लात खाने मैं भी मजा आता है हृदय में प्रेम को बढ़ाओगे, क्षमा भी अपने आप बढ़ने लगेगी हमारे संबंध प्रेम पूर्वक बने किसी से कटुता नहीं हो। यह पर्युषण पर्व एक विशुद्धि का पर्व है एक पवित्रता का पर्व है आत्मशुद्धि का पर्व है। यह राग रंग का त्योहार नहीं है यह वैराग्य का पर्व है, साधना करने का पर्व है। जितनी हम साधना करते है उतना ही हमारे कर्मों का क्षय होता है और पुण्य की प्राप्ति होती है। क्षमा करने से आत्मा का सुख मिलता है। पढ़िए बाल ब्रह्मचारी झिलमिल दीदी का विशेष आलेख
क्षमा को बढ़ाना है तो प्रेम का विस्तार करो क्योंकि जिससे प्रेम होता है उसकी लात खाने मैं भी मजा आता है हृदय में प्रेम को बढ़ाओगे, क्षमा भी अपने आप बढ़ने लगेगी हमारे संबंध प्रेम पूर्वक बने किसी से कटुता नहीं हो। यह पर्युषण पर्व एक विशुद्धि का पर्व है एक पवित्रता का पर्व है आत्मशुद्धि का पर्व है। यह राग रंग का त्योहार नहीं है यह वैराग्य का पर्व है, साधना करने का पर्व है। जितनी हम साधना करते है उतना ही हमारे कर्मों का क्षय होता है और पुण्य की प्राप्ति होती है। क्षमा करने से आत्मा का सुख मिलता है।
हम से जब गलती हो जाती है तब हम एकदम सॉरी बोलते हैं और जब किसी से ज्यादा झगड़ा हो जाता है तो हम उससे बैर बांध लेते हैं पर यह बैर कई दुःख देते हैं इनसे जल्दी निवृत हो जाना चाहिए। नहीं तो इस संसार में आप अनंतकाल तक भटकते रहोगे। आप जानते हो जब एक जैन मुनि दीक्षा लेता है तब अपने सारे वेर भाव की क्षमा याचना करते है और अपने गुरु से सारे दोषों की आलोचना करते हुए अपने हृदय में वात्सल्य और क्षमा को उत्पन्न करता है। श्रावक तो आराधना करता है और साधु साधना करता है। एक समय की महारानी चेलना और राजा श्रेणिक बात कर रहे थे कि कौनसा धर्म ज्यादा बड़ा है।
महारानी तो जैन धर्म को मानने वाली थीं। तब उन्होंने जब धर्म को स्वीकार किया कि जैन धर्म सबसे बड़ा और आत्म साधना करने वाला एक महान धर्म है। तब राजा श्रेणिक को क्रोध आ गया और वो वहां से चले गए। जब वह जंगल से लौट रहे थे तब उन्होंने देखा कि एक जैन मुनि साधना ध्यान मैं लीन है। तब उन्होंने उनको बहुत बुरा कहा कि ओ ढोंगी चल उठ ना जाने कितना बुरा भला कहा और जब वो अपनी साधना से नहीं डिगे। तब राजा ने उन पर जंगली 500 कुत्ते छोड़ दिए पर वो कुत्ते 3 परिक्रमा लगाकर गुरु चरणों में बैठ गए और फिर नहीं डिगे तो राजा ने उनके गले में मरा हुआ सांप डाल दिया और वहां से चले गए और मरे हुए सांप की वजह से उनके पूरे तन पर चींटी चढ़ गई, उनका पूरा शरीर सूज गया पर उनके मन में जरा भी राजा के प्रति क्रोध या दुर्भाव नहीं आया। जब राजा घर पहुंचा और सारा हाल चेलना को सुनाया तब चेलना गर्व से बोली वो जैन मुनि हैं और जैन मुनि कभी ढोंगी नही होते।
राजा बोले वो कबका वहा से भाग गया होगा। तब रानी बोली किचलो आज आपको भी जैन संत की महिमा और आत्मसाधना दिखाती हूं। राजा और रानी चल दिए और देखा कि वो योगी अभी भी उसी मुद्रा में ध्यान लगाए विराजमान हैं। राजा श्रेणिक परम पूज्य उस साधना रत उस महान यशोधर के चरणों में गिर जाता है और अपने पापों की क्षमा मांगता है। रानी और राजा मुनिराज के गले से वो सर्प निकालते हैं और मुनिराज दोनों को एक समान आशीर्वाद प्रदान करते है क्योंकि मुनिराज किसी से भेदभाव नहीं रखते।
वो सबको एक ही नजर से देखते है। इसलिए कभी अपने क्रोध में आकर किसी का अपमान नहीं करना चाहिए। अपने अंदर क्षमा रखना। क्षमा ही जीवन को महान बनाती है। क्षमा ही जीवन को महान बनाता है। क्षमा से ही लोगों का हृदय जीता जा सकता है, क्रोध से नहीं। जीवन में क्षमा को लाए जीवन को उज्ज्वल बनाएं और जीवन में धर्म का झंडा लहराएं।













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