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धर्म प्रभावना रथ के दूसरा पड़ाव का 13वां दिन : बच्चों को भोग के नहीं, धर्म के साधनों के साथ बड़ा करें- मुनि पूज्य सागर


अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज के चातुर्मास धर्म प्रभावना रथ के दूसरे पड़ाव के तेरहवें दिन हाई लिंक सिटी में बड़ी भक्ति भाव से भक्तामर महामंडल विधान में 224 अर्घ्य चढ़ाए गए। इस अवसर पर मुनि श्री ने कहा कि भगवान की आराधना भक्ति जब हम निरंतर करते हैं तो निश्चित रूप से हम इस बात का प्रण कर लेते हैं कि हे भगवन, हे परमात्मा… मैं आज तुम्हारी भक्ति करने के लिए तत्पर हुआ हूं। यदि यह भक्ति समर्पण के साथ होती है तो निश्चित रूप से ही संसार के सुख, मोक्ष सुख की प्राप्ति होती है। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…


इंदौर। अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज के चातुर्मास धर्म प्रभावना रथ के दूसरे पड़ाव के तेरहवें दिन हाई लिंक सिटी में बड़ी भक्ति भाव से भक्तामर महामंडल विधान में 224 अर्घ्य चढ़ाए गए। सर्वप्रथम जिनेंद्र भगवान के अभिषेक व शांति धारा का सौभाग्य आज के भक्तामर महामंडल विधान के पुण्यार्जक कचरूलाल, गिरीश, अमित, नीता, विकास, आशी, ऋषभ, माही रारा परिवार को प्राप्त हुआ। तत्पश्चात नित्य नियम पूजन के साथ भक्तामर महामंडल विधान में आज कुल 48 काव्यों के साथ 2688 अर्घ्य समर्पित किए गए।

आचार्य अभिनंदन महाराज के चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन व अंतर्मुखी परम पूज्य मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज के पाद प्रक्षालन का सौभाग्य आज के पुर्ण्याजक कचरूलाल, गिरीश, अमित, विकास रारा परिवार को प्राप्त हुआ। शास्त्र भेंट का सौभाग्य भागचंद, कपिल गंगवाल (बारदान वाले) परिवार को प्राप्त हुआ।

दान की महिमा का गुणगान न करने वाला गूंगा

इस अवसर पर मुनि श्री ने कहा कि भगवान की आराधना भक्ति जब हम निरंतर करते हैं तो निश्चित रूप से हम इस बात का प्रण कर लेते हैं कि हे भगवन, हे परमात्मा… मैं आज तुम्हारी भक्ति करने के लिए तत्पर हुआ हूं। यदि यह भक्ति समर्पण के साथ होती है तो निश्चित रूप से ही संसार के सुख, मोक्ष सुख की प्राप्ति होती है। जिस भगवान की भक्ति आराधना हम कर रहे हैं क्या वह भगवान सब कुछ देने या कर्म की निर्जरा करने में समर्थ हैं तो यह जरूर सोच लेना कि जब आप निर्मल भाव से भक्ति-अर्चना करेंगे तो वह कर्म के निर्जरा करने में समर्थ होंगे।

जो जिनेंद्र भगवान का चरण स्पर्श करता है, उन पर आस्था रखता है, विश्वास रखता है, तो भगवान निश्चित ही कर्म की निर्जरा करता है। अगर आप अपने पैसों को भोग के साधनों में लगाओगे तो निश्चित रूप से वह पाप का कारण बनेगा और वहीं पर आप अपने धन का उपयोग दान में करोगे तो वह पुण्य का कारण बनेगा और वह पैसा कई गुना होकर आपको रिटर्न होगा। जिन व्यक्तियों में सामर्थ्य भी होता है, शक्ति भी होती है फिर भी वे दान देने का मन नहीं बनाते हैं तो वे अगले भव में मनहीन होते हैं। जो दान की महिमा का गुणगान नहीं करता है वह गूंगा होता है जो शरीर से दान नहीं दे पाता है वह कोढ़ जैसे रोग से पीड़ित हो जाता है। मुनि श्री ने कहा कि यह मैं नहीं कह रहा हूं, यह हमारे शास्त्र कहते हैं। आप आदि पुराण, पद्म पुराण न जाने कितनी ही पुराण में इसका वर्णन पढ़ सकते हैं।

भोग के साधन क्या आपको कभी अपने से जोड़ पाएंगे, क्या आपके अंदर प्रेम के भाव, वात्सल्य के भाव, दया के भाव, दूसरों के सहयोग करने के भाव दे पाएंगे। इस तरह से आप अगर अपने घर में संस्कार और संस्कृति को जिंदा देखना चाहते हैं तो अपने भोग के साधनों के साथ-साथ अपने घर में 10 बाय 10 का या एक छोटा सा कमरा भगवान का जरूर बनाना, जिसमें आराध्य देव को, शास्त्र को विराजित कर सकें और वह ध्यान का केंद्र बन सके। फिर देखो आपके बच्चों में संस्कार और संस्कृति आती है या नहीं। आपने बचपन से ही उन्हें भोग के साधनों के साथ बड़ा किया तो वे कैसे धर्म से जुड़ेंगे, वे कैसे संस्कारित हो पाएंगे, वे कैसे संस्कृति को अपनाएंगे।

पहला कमरा देव, शास्त्र, गुरु का बनाएं

मुनिश्री ने कहा कि बताओ जब आप एकांत में होते हो, डरे हुए होते हो, मुसीबत में होते हो तो सबसे पहले किसका स्मरण आता है सबसे पहले प्रभु का स्मरण आता है और प्रभु के स्मरण के बाद हमारा मन शांत हो जाता है। क्या यह करोड़ों का घर, गाड़ी, यह भोग के साधन आपके मन को उस समय शांत कर पाते हैं। भवन में से भ को हटा दिया जाए तो वन बचता है। वन में रहने वालों का शिकार होता है और जो भवन में रहता है, उसका सम्मान होता है।

तो आप ही सोचिए कि आप भवन में रह रहे हैं या वन में। अगर आपने अपने घर में सबसे पहला कमरा देव, शास्त्र और गुरु के आहार के लिए बनाया है तो आप भवन में रह रहे हैं क्योंकि वहां पर आज भी संस्कार और संस्कृति जीवित है और वहीं पर ऐसा नहीं है 2 बाय 2 के सिंहासन पर कहीं खूंटी पर आपने भगवान को टांग दिया है, शास्त्र को रख दिया है तो आप वन में रह रहे हैं, जहां पर 148 कर्म आपका शिकार कर रहे हैं।

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