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चातुर्मासिक प्रवचन में बह रही ज्ञान की गंगा : खुद का सम्मान चाहते तो सबका सम्मान करना शुरू कर दो – विज्ञानमति माताजी


उदयनगर में चातुर्मासिक प्रवचन के माध्यम से धर्म और ज्ञान की गंगा बहा रहीं वंदनीय आर्यिका विज्ञानमति माताजी ने धर्म सभा में उपस्थित श्रोताओं को संबोधित करते हुए कहा कि अनछने पानी में त्रस जीव होते हैं। कागज के कार्टून में, लकड़ी में, पत्थर में, चौकी के नीचे, जमीन में…हर जगह अनंत जीवों की उत्पत्ति होती रहती है, हमारे प्रमाद व असावधानी से उनका घात हो जाता है। पढ़िए राजीव सिंघाई की रिपोर्ट…


इंदौर। उदयनगर में चातुर्मासिक प्रवचन के माध्यम से धर्म और ज्ञान की गंगा बहा रहीं वंदनीय आर्यिका विज्ञानमति माताजी ने धर्म सभा में उपस्थित श्रोताओं को संबोधित करते हुए कहा कि…

-संसार में सबसे ज्यादा कौन से काय वाले जीव हैं, वनस्पतिकायिक हर स्थान पर अनंतानंत जीव भरे पड़े हैं और हम उन सब जीवों की किस-किस प्रकार से हिंसा करते हैं।

-सुई की नोंक के बराबर काई में अनंत जीव होते हैं, काई हर जगह होती है, घर की छत पर भी काई होती है, हमारे पांव रखते ही अनंत जीवों की हिंसा हो जाती है।

-अनछने पानी में त्रस जीव होते हैं। कागज के कार्टून में, लकड़ी में, पत्थर में, चौकी के नीचे, जमीन में…हर जगह अनंत जीवों की उत्पत्ति होती रहती है, हमारे प्रमाद व असावधानी से उनका घात हो जाता है।

-भैया मकान बनाया है तो उसका प्रायश्चित कर लेना क्योंकि मकान बनाने में बहुत हिंसा होती है। इसलिए जैन लोग खदान का, खुदाई का, खान का, हीरे का काम नहीं कर सकते क्योंकि इन कार्यों में असंख्य असंख्य जीव मृत्यु को प्राप्त होते हैं।

-इस मौसम में हर स्थान पर सम्मूर्छन जीव उत्पन्न होते हैं, इसलिए कुछ भी उठाओ, थोड़ा आंख खोलकर देख लिया करो, कागज के गत्ते पर भी दो इंद्रीय जीव हो जाते हैं, जिन्हें हम कुंथू कहते हैं।

-भले ही एक पूजा कम करना, पहले पूजन सामग्री, चौकी इत्यादि देखकर जमाना….जिसमें जीवों की हिंसा न हो, भगवान की आज्ञा का पालन हो।

-अभी हम हीन संहनन वाले साधु गांव में रहते हैं, पहले उत्कृष्ट संहनन वाले साधु जंगल में रहते थे।

-अगर आप सबका सम्मान करते हो तो आपको भी सम्मान मिलेगा, अगर किसी का जगह जगह तिरस्कार हो रहा है तो समझ लेना इसने पूर्व में साधु का तिरस्कार किया है, किसी की निंदा की है।

-अगर चाहते हो कि तुम्हारा सम्मान हो तो तुम सबका सम्मान करना शुरू कर दो।

-द्रव्य और पर्याय सर्वथा भिन्न नहीं होते और सर्वथा अभिन्न भी नहीं होते। हमारा अनेकांत धर्म है…जीव एवं शरीर अलग अलग हैं और कथनचित एक भी हैं, इसलिए सर्वथा भिन्न मानना या सर्वथा अभिन्न मानना…दोनों गलत हैं।

-अगर मारीच मर जाता तो महावीर कैसे बनता और अगर मारीच नहीं मरता तो भी महावीर कैसे बनता।

-हमें पता है कि जीव कभी मरता नहीं लेकिन जरा सी तबियत खराब नहीं हुई कि….अरे मैं मरा, जल्दी से डॉक्टर के पास ले जाओ, दवा खिलाओ, भले ही उस दवाई में मांस हो, कितनी ही हिंसा से बनी हो। हम आपको हर बीमारी की एक दवाई बताते हैं।

-आपको कितनी भी तकलीफ हो रही हो अकेले में जी भरके रो लेना लेकिन घर वालों के सामने हंसकर, गाकर अपनी बीमारी बताना नहीं तो वो दया वश तुम्हारा नियम तुड़वाकर ही मानेगा, तुमको तकलीफ थोड़े ही होने देगा।

-लंघन करना हर बीमारी की कारगर दवाई है, उपवास नहीं करना है, पानी/नींबू पानी लेना है…शरीर में पानी की कमी नहीं होना चाहिए।

-हम अपनी बात को इतनी इतनी दयनीयता से बताते हैं कि सामने वाला सहायता करने को मजबूर हो जाता है। ये दयनीयता असाता का बंध कराती है।

-हमें इस शरीर से इतना ममत्व है कि इसे बचाने के लिए दुनिया की पूरी ताकत लगाने को तैयार हो जाते हैं।

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