अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज ने बारह भावना प्रवचन श्रृंखला में छठे दिन धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि शरीर आदि कोई भी द्रव्य मेरा नहीं है। मोह के कारण ही मैं इन्हें अपना मान लेता हूं। एक दृष्टि से देखा जाए तो शरीर आदि मेरा है भी और नहीं भी। जब तक शरीर धर्म-ध्यान में सहयोगी रहे तब तो अपना कह सकते हैं और जिस दिन धर्म-ध्यान में सहयोगी नहीं हो, उस दिन शरीर आदि भी मेरा नहीं है। पढ़िए अंशुल जैन और संस्कार जैन की विशेष रिपोर्ट…
इंदौर। श्री 1008 मुनिसुव्रत नाथ दिगम्बर जैन मंदिर, स्मृति नगर में बारह भावना प्रवचन श्रृंखला के छठे दिन अन्यत्व भावना पर धर्म सभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री अभिनंदन सागर महाराज के शिष्य अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज ने कहा कि शरीर आदि कोई भी द्रव्य मेरा नहीं है। मोह के कारण ही मैं इन्हें अपना मान लेता हूं। एक दृष्टि से देखा जाए तो शरीर आदि मेरा है भी और नहीं भी। जब तक शरीर धर्म-ध्यान में सहयोगी रहे तब तो अपना कह सकते हैं और जिस दिन धर्म-ध्यान में सहयोगी नहीं हो, उस दिन शरीर आदि भी मेरा नहीं है। यात्रा में हम जाते हैं और हमारे पास कोई ऐसा व्यक्ति बैठ जाए जो हमें पसंद नहीं है लेकिन हमें यात्रा करनी है और उसके बिना हो नहीं सकती है तो क्या करते हैं, मन न होते हुए भी हम उसके पास बैठते, बात करते हैं, हंसते हैं। यह सब बाहर से करते हैं लेकिन अंदर तो यही चल रहा होता है कि कब यात्रा पूरी हो और कब इससे छुटकारा मिले। बस इसी प्रकार शरीर आदि मेरे नहीं लेकिन इसके बिना कर्मों को काट नहीं सकता। इसे भी तब तक अपना मानना, जब तक कर्म का नाश नहीं हो जाए। जिस दिन हो जाए, उस दिन कहना कि वह तो मेरा था ही नहीं।

आत्मा का ध्यान रखो, शरीर का नहीं
मुनि श्री ने उदाहरण देते हुए कहा है कि जैसे आपके मोबाइल में इंटरनेट नहीं है और आपको दूसरे के मोबाइल से वाईफाई के द्वारा इंटरनेट लेना पड़े तो क्या आप यह सोचते हैं कि दूसरे का मोबाइल कैसा है, अच्छा है, बुरा है, पुराना है, नया है, उसके इंटरनेट का पैक समाप्त तो नहीं हुआ, आपको बस इंटरनेट से मतलब होता है, जिससे आपका मोबाइल चल जाए। आपको कोई मतलब नहीं कि उसका इंटरनेट खत्म हो रहा है। आपका काम हुआ और आप धन्यवाद देखकर आगे चले जाते हैं। बस इसी प्रकार आप को भी आत्मा का ध्यान रखना चाहिए, शरीर का नहीं। जब तक शरीर आत्मसाधना में सहयोगी हो, तब उसका उपयोग करो और जिस दिन काम करना बंद कर दे, उस दिन धन्यवाद देकर आत्मलीन हो जाओ। एक बात का ध्यान रखना कि मोह के कारण शरीर आदि से ममत्व भाव पैदा होता है। इसलिए अशुभ मोहनीय कर्म से बचने के लिए शुभ कार्य करना चाहिए, जिससे शुभ कर्म का बंध हो। तत्वार्थ सूत्र में कहा है कि शुभ कार्य से पुण्य और अशुभ कार्य से पाप का बंध होता है। अन्यत्व भावना का चिंतन करने वाला शुभ कार्य करते हुए पुण्य का बंध करता है। आप सब भी निरंतर अन्यत्व भावना का चिंतन करते हुए संसार के अशुभ कर्मों से बचें। धर्म सभा में क्षुल्लक अनुश्रमण सागर महाराज भी विराजमान थे। सभा का संचालन अजय भैया ने किया।













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