संत परिचय

संत परिचय-1 : आज पढ़िए आचार्य श्री शान्तिसागर जी महामुनि का परिचय  


श्रीफल जैन न्यूज की ओर से जैन संतों और साध्वियों की परिचय की श्रृंखला शुरू की जा रही है। जैन धर्म में मुनि बनना एक बहुत साहसिक और वैराग्य पूर्ण कार्य है। हर कोई व्यक्ति मुनि नहीं बन सकता। जैन दर्शन में मुनियों के आचार- विचार और दिनचर्या पर बहुत ही स्पष्ट और सख्त नियम बनाए हैं। श्रीफल जैन न्यूज का उद्देश्य है कि इस श्रृंखला के जरिए पाठक जान सकें कि जैन धर्म जीवन जीने की कला है। यह अध्यात्म और विज्ञान पर आधारित जीवन मार्ग है और इनके बारे में पढ़कर लोग धर्म की राह पर चल सकें। इसी श्रृंखला की दूसरी कड़ी में आज प्रस्तुत है राजेश पंचोलिया की कलम से आचार्य श्री शांतिसागर महाराज के बारे में…. 


बीसवीं सदी के प्रथम आचार्य चारित्र चक्रवर्ती गुरु नाम गुरु प्रातः स्मरणीय आचार्य श्री शान्तिसागर जी महामुनि के अवतरण दिवस मिति अनुसार आषाढ़ कृष्णा 6 बुधवार दिनांक अनुसार 8 जून (151वां जन्म) वर्ष 2023 मनाया जा रहा है। जानते हैं इन्हीं के बारे में…

भोज ग्राम में सत्यवती जी और भीमगौड़ा पाटिल के यहां सन 1872 में 1008 श्री वासु पूज्य भगवान के गर्भ कल्याणक दिवस आषाढ़ कृष्णा 6 विक्रम संवत 1929 एक महामना का जन्म हुआ, जिनका नाम सातगौड़ा रखा गया। आपसे बड़े 2 भाई तथा एक भाई छोटा तथा एक बहन भी थी। आपमें बचपन से ही धार्मिक संस्कार रहे। 18 वर्ष की उम्र में अपने बिस्तर का त्याग कर दिया।

आजीवन ब्रहचर्य व्रत

-आपने 18 वर्ष की अल्पायु में श्री सिद्ध सागर जी से आजीवन ब्रहचर्य व्रत लिया।

-25 वर्ष की उम्र में जूते चप्पल का त्याग कर दिया।

-32 वर्ष की उम्र में अपने सम्मेद शिखर जी की यात्रा की घी और तेल का आजीवन त्याग कर दिया।

-शिखर जी की यात्रा के बाद 32 वर्ष की उम्र में ही एक समय भोजन का नियम ले लिया और जीवन भर आपने एक समय ही भोजन किया।

क्षुल्लक दीक्षा

-सन् 1915 में आपने उत्तर ग्राम में क्षुल्लक दीक्षा श्री देवेंद्र कीर्ति जी स्वामी से ली।

ऐलक दीक्षा

आपने गिरनार यात्रा सन 1918 में 1008 श्री नेमीनाथ भगवान की 5वी टोंक पर स्वयं ने ऐलक दीक्षा ली।

मुनि दीक्षा

-सन् 1920 यरनाल, कर्नाटक में आपने मुनि दीक्षा ग्रहण की।

ये रहा खास 

-आपको सन् 1924 में आचार्य पद दिया गया।

-सन् 1925 में श्री श्रवणबेलगोला महामस्तकाभिषेक के बाद गुरुणा गुरु की उपाधि दी गई।

-आपने दीक्षा गुरु श्री देवेंद्र कीर्ति जी को पुनः मुनि दीक्षा दी इसलिए भी गुरुणा गुरु कहा जाता है।

-सन् 1937 में आपको चारित्र चक्रवर्ती पद दिया गया।

जिनवाणी संरक्षण

-आपकी प्रेरणा से धवल जयधवला टीका वाले षटखंडागम महाबंध कषाय पाहुड ग्रन्थ त्रय को 50 मन तांबे पर 2664 पत्रों पर अंकित कराया। यह ग्रंथ आज भी फलटण में सुशोभित विराजित है।

उपसर्ग

-आपके जीवन में सर्प के कोंगनोली, गोकाक, कौंनुर, शेडवाल आदि 5 से अधिक अनेक उपसर्ग।

-सिंह के गोकाक, मुक्तागिर जंगल, श्रवणबेलगोला यात्रा, सोनागिर, बावनगजा, द्रोणगिरी सिद्ध क्षेत्रों में 6 से अधिक उपसर्ग से अधिक। मकोड़े के, चींटी के और अन्य मानव जन्य उपसर्ग हुए हैं। आपने नाम अनुरूप शांति के सागर बन कर उपसर्ग सहन किये।

-आपने अपने जीवन के साधु जीवन के 40 वर्षों में 9938 उपवास किए।

आपने 26 मुनि दीक्षा दी

-प्रथम मुनि शिष्य श्री वीरसागरजी

-4 आर्यिका दीक्षा, 16 ऐलक दीक्षा, 28 क्षुल्लक दीक्षा, 14 क्षुल्लिका दीक्षा, कुल 88 आपने दीक्षाएं दीं।

-आपके बड़े भाई भी आपसे मुनि दीक्षा लेकर मुनि श्री वर्द्धमान सागर जी बने।

– 1105 दिन तक अनाज का त्याग, विधर्मियों के मंदिर प्रवेश के विरोध में किया।

-8 वर्षों तक श्रावकों ने केवल दूध, चावल, पानी दिया।

-8 दिन तक आहार में पानी ही नहीं दिया।

-ललितपुर चातुर्मास में सन् 1929 में सभी रसों का आजीवन त्याग किया।

-24 अक्टूबर, 1951 में गजपंथा जी में 12 वर्ष की नियम संल्लेखना ली।

-26 अगस्त, 1955 को लिखित पत्र से मुनि श्री वीर सागर जी को आचार्य पद दिया।

-36 दिन की संल्लेखना में 18 सितम्बर, 1955 को आपकी उत्कृष्ट समाधि हुई।

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