श्रीक्षेत्र श्रवणबेलगोला मठ के भट्टारक जगद्गुरु कर्मयोगी स्वस्तिश्री चारुकीर्ति भट्टारक स्वामी जी तीन मई, 2023 को 74वां जन्म मनाया जा रहा है। पढ़िए ऐसे महान कर्मयोगी के बारे में इस विशेष आलेख में …
श्रवणबेलगोला। कर्मशील, सौम्य, मौन संत, जगद्गुरु कर्मयोगी स्वस्तिश्री चारुकीर्ति भट्टारक स्वामी का जन्म 3 मई, 1949 को सिद्धक्षेत्र वारंगा में हुआ था। उनका जीवन एक खुली किताब रहा, जिसमें अनुशासन, कर्त्तव्यनिष्ठा, दृढ़ संकल्प और विनम्रता की सुरभि से हर पन्ना महका। उनके जीवन चरित्र के ये पन्ने आज हर आम व खास व्यक्ति को सहज ही आकर्षित करते हैं, तभी तो आज देश के हर कोने में उनके हजारों-लाखों अनुयायी हैं।
उनके व्यक्तित्व की पहचान उनके कार्य हैं और यही उनका परिचय भी। श्रीक्षेत्र श्रवणबेलगोला में उनके द्वारा किए गए विकास कार्य किसी से छिपे नहीं है और न ही उनके भट्टारक बनने से पूर्व यहां की दशा। विगत 51 सालों में उन्होंने श्रीक्षेत्र ही नहीं, कर्नाटक प्रदेश के जैन समाज को संगठित रखकर दिशा देने के लिए जो भी कार्य किए, वे काबिले तारीफ हैं। श्रवणबेलगोला की विकास प्रक्रिया और ख्याति को उच्चतम सोपान पर पहुंचाने के लिए किए गए प्रयासों की बानगी को देखते हुए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि स्वामीजी वर्तमान श्रवणबेलगोला के कुशल चितेरे रहे।
श्रीस्वामी जी का जीवन परिचय
जन्म- सिद्धक्षेत्र वारंगा,
पिता- चंद्रराज जी इंद्र,
माता- श्रीमती कान्तेजी
जन्म तारीख- 3 मई सन् 1949,
जन्म नाम- रत्न वर्मा जी
संन्यास दीक्षा:- 12 दिसंबर 1969
19 अप्रैल महावीर जयंती पर 1970 में श्रवणबेलगोला मठ में पट्टाभिषेक कर इनका पीठाधिकारी स्वस्ति श्री चारुकीर्ति भट्टारक स्वामी जी नाम पड़ा। तब से वे श्री क्षेत्र की अभिवृद्धि, श्रुत संवर्धन, समाज कल्याण और बच्चों के लिए शिक्षा सुविधा के कार्यों में जुटे रहे।
हिंदी और संस्कृत साहित्य विशारद, कई भाषाओं के ज्ञाता
परम पूज्य स्वामीजी की जीवनयात्रा की ओर दृष्टिनिक्षेप करें तो पाएंगे कि संन्यास से पूर्व उनका नाम रत्नवर्मा था। सही मायने में वह कर्नाटक ही नहीं, समस्त जैन समाज के अनमोल रत्न रहे। जिनके मार्गदर्शन में आज कई संगठन और तीर्थक्षेत्रों का कार्य सुचारु रूप से चल रहा है। उनका जन्म 3 मई, 1949 को हुआ और 20 साल बाद 12 दिसंबर, 1969 को उन्होंने संन्यास दीक्षा ग्रहण की। तभी से वे सतत क्रियाशील रहे। दीक्षा के चार माह बाद ही उन्होंने 19 अप्रैल 1970 को श्रवणबेलगोला मठ की बागडोर संभाल ली। उन्होंने मैसूर से इतिहास में एम.ए., बैंगलोर विद्यापीठ से तत्वज्ञान में एम.ए. जैनागम का विशेष अध्ययन किया। उन्होंने हिंदी साहित्य विशारद और संस्कृत साहित्य विशारद किया। वे कन्नड़, मराठी, संस्कृत, प्राकृत, हिंदी, अंग्रेजी आदि भाषाओं के ज्ञाता थे।
करते रहे जैन साहित्य को संरक्षित
परम पूज्य स्वामीजी ने जैन साहित्य के प्रचार-प्रसार और उनके संरक्षण के प्रयासों को भी बड़ी रुचि के साथ किया। जैन साहित्य उनकी विद्वत्ता और समर्पित प्रयासों के कारण यहां फल-फूल रहा है। आने वाले समय में स्वामी जी यहां प्राकृत विश्वविद्यालय खोलने के इच्छुक थे।
साधना, ध्यान, अध्ययन को बनाया था जीवन का लक्ष्य
दिगंबर जैन समाज की लगभग सभी संस्थाएं स्वामी जी के पास मार्गदर्शन हेतु आती थीं और उन्हीं के अनुसार कार्य करती थीं। बीजापुर सहस्त्रफणी पार्श्वनाथ मंदिर, नल्लुर समवशरण मंदिर, मकुर्ल आदिनाथ मंदिर, शालीग्राम भक्तामर मंदिर, आर्सिकेरी सहस्त्रकूट जिनालय व मायसंद्रा मंदिर के वे गौरव अध्यक्ष रहे थे। जहां के सभी कार्य उन्हीं के मार्गदर्शन में होते रहे हैं। परम पूज्य स्वामी ने 1997 से अपनी चर्या में चातुर्मास चर्या को शामिल किया था। तब से अब तक आप 16 चातुर्मास कर चुके। सामाजिक कार्यों व मठ के दायित्वों को निभाते हुए उन्होंने आध्यात्मिक और आत्मिक साधना को भी पूरा समय दिया। प्रतिवर्ष मौन साधना, ध्यान, अध्ययन, स्वाध्याय नियमित तौर पर करते थे। तप और त्याग भी साथ-साथ चलता रहता खा।
करते थे पद विहार
वर्ष 1997 के बाद से उन्होंने गाड़ी का प्रयोग कम किया और 2002 से 2009 तक तो उन्होंने पद विहार ही किया। स्वामी जी के गाड़ी त्याग के पीछे एक महत्वपूर्ण कारण था। इस दौरान उनके मार्गदर्शन में विद्वानों ने धवला, जयधवला और महाधवला के 40 भागों का कन्नड़ में अनुवाद किया। स्वामी जी ने इन सभी का संपादन किया है। इसमें से 21 का प्रकाशन हो चुका है और बाकी प्रकाशन की प्रक्रिया में है। कार्य पूर्ण होने के बाद भी वह केवल अत्यावश्यक कार्यों के लिए बाहर जाने पर ही गाड़ी का प्रयोग करते थे अन्यथा यहां तो पदविहार ही करते थे।
फोन का किया था त्याग
वर्ष 2001 से फोन पर बात करने का उन्होंने त्याग किया था। इतने व्यस्त कार्यक्रमों और इतनी बड़ी जिम्मेदारियों को निभाने के बावजूद फोन के बिना सभी कार्य सुचारू रूप से चलाना अपने आप में एक विलक्षण गुण है। ऐसे बहुमुखी प्रतिभावान, गुणी और विनम्र भट्टारक जी के ही कारण श्रीक्षेत्र की पहचान आज चहुंओर है। यहां आने वाले अतिथि, यात्री, त्यागी व संत सभी इनके आत्मीय स्वागत और उत्तम व्यवस्थाओं से अभिभूत होकर प्रसन्नचित्त लौटते हैं। मठाधिपति के पद पर आसीन होकर विनम्रता का भाव लिए यह सहज व्यक्तित्व हर आम और खास के लिए प्रेरणा का स्त्रोत रहा है। हम सभी को स्वामी जी से समर्पण, श्रद्घा, लगन और निष्ठा सीखनी होगी, तभी तो समाज को एक माला में पिरोकर धर्म रक्षा, तीर्थ रक्षा, संत रक्षा और देश रक्षा का फर्ज पूरा कर सकेंगे। विश्व शांति के लिए कार्य करने पर 2017 में कर्नाटक सरकार ने स्वामी जी को महावीर शांति पुरस्कार से नवाजा था। इसके तहत 10 लाख रुपए, प्रशस्ति, शॉल और श्रीफल देकर सम्मानित किया गया था।
समाज सेवा में रहते थे अग्रणी
– 2006 के महामस्तकाभिषेक के समय स्वामीजी ने पूरे गांव में सरकार व प्रशासन के सहयोग से शौचालय निर्माण का कार्य पूरा कराया
– आसपास के सभी गांवों के बीमार व्यक्तियों के स्वास्थ्य लाभ हेतु मोबाइल चिकित्सालय का संचालन किया
– जैन मठ से जैन-जैनेतर लोगों को हर माह नकद राशि का सहयोग किया
– बाहुबली बाल चिकित्सालय में 100 बेड और 100 बेड के जनरल अस्पताल का संचालन किया जा रहा है
– कर्नाटक में बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में राशन, कपड़े, चिकित्सा आदि की व्यवस्था की गई
– बच्चों को संस्कारित करने के लिए ब्रह्मचर्य आश्रम का संचालन, जिसमें धार्मिक और लौकिक दोनों प्रकार की शिक्षा प्रदान की जाती है
– नर्सरी से लेकर इंजीनियरिंग कॉलेज का संचालन किया जा रहा है
– जैन साहित्य और अन्य साहित्यों के प्रचार-प्रसार हेतु अनेक साहित्यकारों, विद्वानों और पत्रकारों को प्रतिवर्ष पुरस्कार प्रदान किया जाता है और सम्मेलनों का आयोजन होता है
– आर्थिक दृष्टि से पिछड़े समुदाय के व्यक्तियों को चिकित्सा सुविधा के साथ असहाय, मंदबुद्धि को 1100 रुपये प्रतिमाह सदस्यता राशि प्रदान की जाती है
– 1981 में पूरे देश में जनमंगल कलश का भ्रमण करवाया
– प्राचीन साहित्य के प्रकाशन के लिए अक्षर कलश योजना प्रारंभ की गई
– 6000 से अधिक पांडुलिपियां सुरक्षित की गईं
– साधुओं की सेवा के लिए त्यागी सेवा समिति अलग से बनाई गई
स्वामीजी ने 53 वर्षों में जो कुछ किया है, वह समाज के लिए प्रेरणास्पद है। सभी तरह के मठों, संस्थाओं और मंदिरों का संचालन धार्मिक क्रियाकलापों के साथ सामाजिक कार्यों के संचालन किया जा सका है।
परमपूज्य चारुकीर्ति भट्टारक स्वामी ने अपने सिद्धहस्त करकमलों से 9 भट्टारक स्वामीजी को दीक्षा प्रदान कर अपना शिष्यत्व प्रदान किया है, जो अलग-अलग मठों की बागडोर संभाते हुए उन क्षेत्रों के विकास हेतु प्रतिबद्ध हैं-
1. स्वस्ति श्री ललित कीर्ति भट्टारक स्वामी- कारकल मठ
2. स्वस्ति श्री भुवनकीर्ति स्वामी – कनकगिरि मठ
3. स्वस्ति श्री भानुकीर्ति भट्टारक स्वामी- कम्ब्दहली मठ
4. स्वस्ति श्री धवलकीर्ति स्वामी जी – अर्हंतगिरि मठ
5. स्वस्ति श्री चारुकीर्ति स्वामी- मूडबिद्री जैन मठ
6. स्वस्ति श्री देवेंद्रकीर्ति स्वामी (धर्मकीर्ति स्वामि) – हुमचा पद्मावती मठ
7. स्वस्ति श्री लक्ष्मीसेन स्वामी जी – नरसिंहराजपुर मठ (ज्वालामालिनी) मठ
8. स्वस्ति श्री भट्टाकलंक भट्टारक स्वामी जी – सौन्दा मठ
9. अरतिपुर के पट्ट विचारक क्षुल्लक सिद्धांतकीर्ति स्वामी जी













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