जिसने जीवन की वास्तविकता को समझ लिया है, उसने जीवन की सात्विकता को पा लिया है। यह बात मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज ने साइंस ऑफ लिविंग में कही। पढ़िये जयकुमार जैन जलज हटा/राजेश रागी बकस्वाहा की रिपोर्ट…
कुण्डलपुर। साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में हम हर दिन एक अनोखा प्रयास करते हैं अपने जीवन को समझने का। ताकि हम उस जीवन को भार नहीं उपहार बना सकें। जिसने जीवन की वास्तविकता को समझ लिया है, उसने जीवन की सात्विकता को पा लिया है। यह बात मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज ने कही। उन्होंने कहा कि वर्तमान परिपेक्ष में हमने लोगों के हिसाब से चलने का मन बना लिया है। जिससे वह सात्विकता और वास्तविकता पर भी पोता-पोती की जा रही है। हर एक कार्य की एक वय होती है। उस उम्र तक ही वह कार्य शोभनीय माना जाता है।
उसके बाद वह निंदनीय कार्य की श्रेणी में आ जाता है। आचार्य कहते हैं, जिसने त्रिवर्ग की समीचीनता को समझ लिया, उसने जीवन के रहस्य को समझ लिया है। यह जीवन का वर्गीकरण है यह सेंस आफ लिविंग है। अर्थ ,काम और धर्म यह तीनों पुरुषार्थ ही त्रिवर्ग कहलाते हैं। अर्थ अर्थात धनार्जन करना, काम अर्थात स्वदार संतोष व्रत। धर्म अर्थात सतकार्य जिससे स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति हो सके। क्लासिफिकेशन ऑफ लाइफ अर्थात जीवन का वर्गीकरण जो जैनाचार्यो ने किया है वैसा सूक्ष्म विवेचन कहीं भी देखने सुनने और पढ़ने को तक नहीं मिलता है। अर्थ, काम , धर्म और मोक्ष इन चार पुरुषार्थों का अपना काल है , अपना उद्देश्य है और अपनी उपयोगिता है।
अर्थ पुरुषार्थ के लिए षट्कर्म की व्यवस्था दी है।काम पुरुषार्थ के लिए विवाह की व्यवस्था दी है। धर्म पुरुषार्थ के लिए अणुव्रत अथवा महाव्रत की व्यवस्था आचार्यों ने दी है। मोक्ष पुरुषार्थ के लिए श्रेणी आरोहण की व्यवस्था दी है। हमारे आत्म कल्याण की यह कुछ ऐसी अवस्थाएं हैं जिनके माध्यम से हम सभी के अंदर विद्यमान उस आत्म तत्व को सिद्ध किया जा सकता है। यह सभी जानकारी आपको भी हो सकती है। परंतु इसका प्रयोग का कभी विचार नहीं किया, इसलिए यह संसार चक्र चल रहा है। आचार्य कहते हैं कि परे मोक्ष हेतु अर्थात धर्म पुरुषार्थ और मोक्ष पुरूषार्थ मोक्ष के कारण है। अभी आप लोगों से पूछा जाए कि बताओ किस-किस को मोक्ष जाना है? उत्तर मिला सभी को।
पर क्या हमारे लक्षण हमारे लक्ष्य के अनुरूप हैं। मोक्ष हम सभी का लक्ष्य है तो उसके अनुरूप ही हमारे लक्षण होना चाहिए। आज तक किसी ने नहीं सुना होगा कि पोता- पोती करके किसी को मोक्ष मिला है। पोता- पोती का मतलब श्रृंगार। श्रृंगार काम पुरुषार्थ के अंतर्गत आता है। वह भी एक उम्र तक ही सही लगता है। पोता -पोती को संस्कार देना है तो उनके सामने पोता -पोती मत करो। आज प्रायः करके सभी की एक सामान्य शिकायत रहती है कि बच्चे हमारी सुनते नहीं है। हम आज आपसे यह प्रश्न करते हैं कि क्या आप आचार्यों की सुन रहे हैं। आज कोई भी वृद्धावस्था को स्वीकार करना नहीं चाहता। उसके लिए नित नए प्रयोगों के माध्यम से उस पर विजय प्राप्त करना चाहता है।
जिस प्रकार नए-नए युवा- युवती विवाहित हो कर जीवन यापन करना चाहते हैं, उसी प्रकार से आज वृद्धजन भी उसी प्रकार जीवन यापन करना चाहते हैं। यह एक ऐसी निंदनीय मानसिकता बन चुकी है जिससे उनके जीवन से सात्विकता खोती जा रही है। कहते हैं कि लोगों के लिए करना पड़ता है। सब के हिसाब से रहना पड़ता है। वक्त और जमाने के हिसाब से चलना पड़ता है। आपको इस वृद्धावस्था में जब पोता- पोती (मेक-अप )में आनंद आ रहा है। फिर आपको देखने वाले पोता -पोती पर उसका क्या असर होगा आपने इस पर कभी कोई विचार किया है। आप उन्हें कौन से संस्कार दे रहे हैं? यह प्रश्न बहुत बड़ा है। इसका उत्तर भी आपके पास है पोता पोती बालो ध्यान से सुनो अगर आपको अपने पोता -पोती को संस्कारित करना है तो पोता- पोती लीपा-पोती छोड़ो।













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