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राग तो आग है, साम्यभाव को करो सेवन - आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी : आचार्य ने कहा, आडम्बर धर्म नहीं है

एक योगी के राग में दूसरे योगियों को मत भूल जाना और जिनशासन कहता है, जिनागम कहता है कि राग अच्छा होता नहीं है। ज्ञानी ! राग तो आग है, इसका काम जलाना है। पढ़िए राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट…


इंदौर।  भगवान् से यही प्रार्थना करना कि मैं अरिहंत के राग में अरहंत को न भूल जाऊं, निर्ग्रथ के राग में निर्ग्रथों को न भूल जाऊं और ग्रंथ के राग में निर्ग्रथों को न भूल जाऊं

। वस्तुस्वभाव को समझो। 

आपको राग हो गया कि मेरे बाहुबली भगवान् से बड़ा कोई नहीं है। हे ज्ञानी ! बाहुबली के राग में बाहुबली को मत भूल जाना। एक योगी के राग में दूसरे योगियों को मत भूल जाना और जिनशासन कहता है, जिनागम कहता है कि राग अच्छा होता नहीं है। ज्ञानी ! राग तो आग है, इसका काम जलाना है। इसलिए राग- आग से बचना है तो साम्यभाव का सेवन करो ।

यह कहना है आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी का।

अपने प्रवचन में उन्होंने कहा कि जो-जो जले हैं, जो-जो जल रहे हैं, वो सब राग के कारण जले हैं।

मारीचि से पूछना कि आपने तीर्थंकर ऋषभदेव की बात को नहीं माना, निज का मत चला दिया। बुद्धि के बल पर आपने 363 मिथ्यामतों का संचालन किया।। हे वर्द्धमान महावीर ! आपने मारीचि की पर्याय में जिन मतों का प्रारम्भ किया था, उनको आप महावीर बनकर भी ठीक नहीं कर पाए हो।

इसलिए वक्ताओं से कह देना कि जिनवाणी की गद्दी पर उतना ही बोलना जितना आगम हो। ध्यान दो, आडम्बर धर्म नहीं है, इसलिए बहुत ताम-झाम की कोई आवश्यकता नहीं है।

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