श्री 1008 चंद्रप्रभु दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र, देहरा तिजारा में अष्टानिका महापर्व पर श्रमणाचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज ने भेद विज्ञान, सम्यग्दर्शन और आत्मकल्याण पर आधारित प्रेरणादायी प्रवचन दिए। उन्होंने सिद्धत्व प्राप्ति के लिए मिथ्यादर्शन के त्याग और सम्यग्दर्शन को जीवन का आधार बताया। पढ़िए श्रीफल साथी सोनल जैन की यह रिपोर्ट।
देहरा तिजारा। श्री 1008 चंद्रप्रभु दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र, देहरा तिजारा में विराजमान जिनागम पंथ प्रवर्तक संघ शिरोमणी, परम पूज्य भवलिंगी संत श्रमणाचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज ससंघ ने पावन अष्टानिका महापर्व के अवसर पर श्रद्धालुओं को आत्मकल्याण, भेद विज्ञान और मोक्षमार्ग का प्रेरणादायी संदेश प्रदान किया।
भेद विज्ञान से सिद्धत्व की प्राप्ति
अपने मंगल प्रवचन में श्रमणाचार्य श्री विमर्शसागर जी महाराज ने कहा कि
“भेद ज्ञान की शक्ति से सहज गुणों से सजना है, सिद्धों की भक्ति गुणवान बनाए रे। जीवन है पानी की बूंद, कब मिट जाए रे, होनी-अनहोनी कब क्या घट जाए रे।”
उन्होंने कहा कि यदि सिद्ध परमात्मा बनना है तो भेद विज्ञान का आश्रय लेना अनिवार्य है। आत्मा और शरीर का भेद जाने बिना मोक्षमार्ग की यात्रा संभव नहीं है। आज तक जितनी भी आत्माएँ सिद्ध बनी हैं, उन्होंने भेद विज्ञान के माध्यम से ही अपने शुद्ध स्वरूप को प्राप्त किया है।
सम्यग्दर्शन है मोक्षमार्ग का प्रथम द्वार
महाराजश्री ने कहा कि सिद्ध भगवान का संदेश स्पष्ट है कि आत्मकल्याण के लिए सबसे पहले मिथ्यादर्शन का त्याग कर सम्यग्दर्शन को धारण करना आवश्यक है। सम्यग्दर्शन ही मोक्षमार्ग का प्रथम द्वार है और यही आत्मा को शुद्धता एवं सिद्धत्व की ओर अग्रसर करता है।
श्रद्धालुओं ने लिया धर्मलाभ
अष्टानिका महापर्व के अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने प्रवचन का लाभ प्राप्त किया। उपस्थित धर्मप्रेमियों ने भक्ति, स्वाध्याय एवं आत्मचिंतन के माध्यम से अपने जीवन को धर्ममय बनाने का संकल्प लिया।
समाजजन रहे उपस्थित
इस अवसर पर देहरा जैन मंदिर अध्यक्ष मुकेश जैन, महामंत्री नरेंद्र जैन, प्रचार मंत्री उमंग जैन, चातुर्मास अध्यक्ष पटेल जैन, अंशुल जैन, नवीन जैन, संजय जैन, वरुण जैन सहित अनेक धर्मप्रेमी श्रद्धालु उपस्थित रहे।













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