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अपनों के बीच, अपनों के साथ विवाह एक अविस्मरणीय अनुभव : पारिवारिक संस्कारों और सामाजिक एकता को सहेजने का माध्यम — एडवोकेट धर्मेंद्र जैन


वरिष्ठ समाजसेवी एडवोकेट धर्मेंद्र जैन का मानना है कि विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का सांस्कृतिक और सामाजिक मिलन है। उन्होंने विवाह समारोहों में परंपराओं, रिश्तों और पारिवारिक मूल्यों को बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया। पढ़िए श्रीफल साथी मनोज जैन नायक की यह विशेष रिपोर्ट।


मुरैना। जैन मित्र मंडल, मुरैना के संस्थापक एवं वरिष्ठ समाजसेवी एडवोकेट धर्मेंद्र जैन ने विवाह संस्कारों के बदलते स्वरूप पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि सामाजिक एवं पारंपरिक विवाह भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर हैं। उनके अनुसार विवाह केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि दो परिवारों, रिश्तों और संस्कारों का भावनात्मक मिलन होता है।

विवाह से जुड़े हैं संस्कार और रिश्ते

उन्होंने कहा कि आजकल मंदिर या कोर्ट में सादगी से विवाह करने की सलाह दी जाती है, जिसका उद्देश्य अनावश्यक खर्च रोकना है। हालांकि, यदि यह प्रवृत्ति व्यापक हो गई तो विवाह से जुड़ी अनेक पारंपरिक रस्में, पारिवारिक मेल-मिलाप और सामाजिक सहभागिता धीरे-धीरे समाप्त हो सकती है।

रिश्तों को मजबूत बनाता है विवाह समारोह

एडवोकेट धर्मेंद्र जैन ने कहा कि विवाह समारोह दूर-दराज के रिश्तेदारों और परिवारजनों के मिलने का महत्वपूर्ण अवसर होते हैं। ऐसे आयोजनों से नई पीढ़ी अपने परिवार, परंपराओं और रिश्तों से परिचित होती है, जिससे सामाजिक एवं पारिवारिक संबंध और अधिक मजबूत बनते हैं।

सादगी हो, लेकिन संस्कार भी रहें

उन्होंने स्पष्ट किया कि विवाह में दहेज और दिखावे का विरोध किया जाना चाहिए तथा अनावश्यक खर्चों में कटौती होनी चाहिए। वहीं, दोनों परिवारों को मिलकर विवाह का दायित्व निभाते हुए ऐसे आयोजन करने चाहिए, जिनमें संस्कार, आत्मीयता और सामाजिक सहभागिता बनी रहे।

सामाजिक सहयोग से मिलता है संबल

उन्होंने कहा कि समाज और परिवार के बीच संपन्न विवाह नवदंपती को भावनात्मक, सामाजिक और सांस्कृतिक सुरक्षा प्रदान करते हैं। समान परंपराओं और जीवनशैली के कारण पारिवारिक तालमेल बेहतर रहता है तथा सुख-दुख में रिश्तेदारों और समाज का सहयोग भी सहज रूप से प्राप्त होता है।

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