श्रुत पंचमी जैन धर्म का एक ऐसा पावन पर्व है, जो हमें ज्ञान, विनय और कृतज्ञता का संदेश देता है। यह केवल शास्त्रों की पूजा का दिन नहीं है, बल्कि उन महान आचार्यों को स्मरण करने का अवसर है, जिन्होंने अपने तप, त्याग और पुरुषार्थ से जिनवाणी को सुरक्षित रखकर आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाया। आज पढ़िए, श्रीफल जैन न्यूज़ की संपादक रेखा संजय जैन का यह विशेष आलेख…
आज हम भगवान महावीर के उपदेशों को पढ़ पा रहे हैं, आगमों का अध्ययन कर पा रहे हैं और मोक्षमार्ग को समझ पा रहे हैं, तो इसका श्रेय हमारी गौरवशाली श्रुत परंपरा को जाता है। इसलिए श्रुत पंचमी को जिनवाणी के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता का महापर्व कहा जाता है।
जिनवाणी : पंचम काल में साक्षात् तीर्थंकर
वर्तमान पंचम काल में तीर्थंकर भगवान प्रत्यक्ष रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी दिव्यवाणी आज भी शास्त्रों के रूप में हमारे सामने विद्यमान है। यही कारण है कि आचार्यों ने जिनवाणी को साक्षात् तीर्थंकर स्वरूप माना है।
प्रतिमा हमें भगवान का स्वरूप दिखाती है, लेकिन जिनवाणी हमें भगवान के विचारों, सिद्धांतों और मोक्षमार्ग से परिचित कराती है। मंदिर हमें भगवान तक पहुंचाता है, जबकि जिनवाणी हमें भगवान बनने का मार्ग बताती है।
षट्खंडागम की रचना और श्रुत पंचमी का प्रारंभ
दिगंबर जैन परंपरा के अनुसार ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी के दिन आचार्य पुष्पदंत और आचार्य भूतबलि ने अपने विद्यागुरु आचार्य धरसेन से प्राप्त आगम ज्ञान को लिपिबद्ध कर षट्खंडागम जैसे महान ग्रंथ की रचना पूर्ण की थी।
गिरनार पर्वत की पवित्र गुफा में विराजमान आचार्य धरसेनाचार्य को चिंता थी कि यदि यह ज्ञान सुरक्षित नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियां इससे वंचित हो जाएंगी। उन्होंने योग्य शिष्यों को यह ज्ञान प्रदान किया और उसी ज्ञान के आधार पर षट्खंडागम की रचना हुई।
जब यह महान कार्य पूर्ण हुआ, तब देवों ने भी जिनवाणी का महोत्सव मनाया। तभी से ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी को श्रुत पंचमी के रूप में मनाने की परंपरा प्रारंभ हुई। यह दिवस “प्राकृत भाषा दिवस” के रूप में भी विशेष महत्व रखता है।
ज्ञान आराधना का महान पर्व
श्रुत पंचमी हमें यह स्मरण कराती है कि जीवन में सबसे बड़ा धन ज्ञान है। धन-संपत्ति, वैभव और पद प्रतिष्ठा समय के साथ समाप्त हो सकते हैं, लेकिन सम्यक ज्ञान आत्मा का शाश्वत धन है।
इस दिन मंदिरों और घरों में विराजमान आगम ग्रंथों, शास्त्रों और धार्मिक पुस्तकों की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। पुराने ग्रंथों की साफ-सफाई, जीर्णोद्धार, नए वस्त्रों में वेष्टन और संरक्षण का कार्य किया जाता है। यह केवल परंपरा नहीं, बल्कि जिनवाणी के प्रति हमारी विनय और श्रद्धा का प्रतीक है।
बदलते समय में श्रुत संरक्षण की आवश्यकता
आज का युग तकनीक का युग है। मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने जीवन की गति बदल दी है। ऐसे समय में श्रुत पंचमी हमें यह संदेश देती है कि आधुनिकता के साथ-साथ अपनी आध्यात्मिक विरासत को भी सुरक्षित रखना आवश्यक है।
केवल शास्त्रों की पूजा करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें पढ़ना, समझना और जीवन में उतारना भी आवश्यक है। हमें प्राचीन पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण करना चाहिए, जैन ग्रंथों को ई-बुक स्वरूप में उपलब्ध कराना चाहिए तथा युवाओं तक जिनवाणी का संदेश आधुनिक माध्यमों से पहुंचाना चाहिए।
हमारी अमूल्य धरोहर : जैन साहित्य
जैन साहित्य भारतीय संस्कृति का अक्षय खजाना है। जैन आचार्यों ने दर्शन, अध्यात्म, व्याकरण, गणित, साहित्य, ज्योतिष और अनेक विषयों पर विपुल साहित्य की रचना की है।
आज भी देश के अनेक शास्त्र भंडारों में हजारों प्राचीन हस्तलिखित पांडुलिपियां सुरक्षित हैं। इन ग्रंथों में केवल धर्म नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और सभ्यता का इतिहास भी सुरक्षित है।
हमारे पूर्वज देव प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा जितना ही पुण्य शास्त्रों को ग्रंथ भंडार में विराजमान कराने को भी मानते थे। यही कारण है कि आज भी यह ज्ञान परंपरा जीवित है।
शास्त्रों की रक्षा हमारा दायित्व
एक मंदिर यदि नष्ट हो जाए तो उसका पुनर्निर्माण किया जा सकता है। एक प्रतिमा खंडित हो जाए तो नई प्रतिमा विराजमान की जा सकती है। लेकिन यदि किसी प्राचीन पांडुलिपि का एक पृष्ठ भी नष्ट हो जाए तो उसे पुनः प्राप्त नहीं किया जा सकता।
इसलिए शास्त्रों और पांडुलिपियों की रक्षा करना प्रत्येक श्रावक-श्राविका का धर्म है। हमें उनके संरक्षण, संवर्धन और प्रकाशन के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए।
श्रुत पंचमी पर हमारा संकल्प
इस पावन अवसर पर हम सभी संकल्प लें—
• जिनवाणी का नियमित स्वाध्याय करेंगे।
• घर और मंदिर में विराजमान शास्त्रों की विनयपूर्वक सेवा करेंगे।
• प्राचीन पांडुलिपियों के संरक्षण में सहयोग देंगे।
• युवाओं को धर्म और जिनवाणी से जोड़ने का प्रयास करेंगे।
• सोशल मीडिया और आधुनिक माध्यमों से जिनवाणी का प्रचार-प्रसार करेंगे।
• प्राकृत भाषा और जैन साहित्य के अध्ययन को प्रोत्साहित करेंगे।
निष्कर्ष
श्रुत पंचमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कृति और आध्यात्मिक विरासत के संरक्षण का महाअभियान है। यह हमें बताती है कि यदि जिनवाणी सुरक्षित रहेगी तो धर्म सुरक्षित रहेगा, और यदि धर्म सुरक्षित रहेगा तो समाज में संस्कार, सदाचार और आत्मकल्याण की ज्योति सदैव प्रज्वलित रहेगी।
आइए, इस श्रुत पंचमी पर केवल जिनवाणी की पूजा ही न करें, बल्कि उसे पढ़ने, समझने और जीवन में उतारने का संकल्प लें। यही भगवान महावीर, आचार्य धरसेन, आचार्य पुष्पदंत और आचार्य भूतबलि के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
“जिनवाणी केवल पुस्तक नहीं, आत्मा को परमात्मा बनाने का मार्गदर्शन है।”













Add Comment