देव शास्त्र गुरु हमारे आराध्य है भगवान श्री आदिनाथ से लेकर भगवान श्री महावीर स्वामी तक सभी तीर्थंकरों ने केवल ज्ञान को प्राप्त कर समवशरण में दिव्य देशना दी। जिसे गणघर स्वामी के माध्यम से धर्म देशना जिनवाणी सभी तक पहुंचती थी। जयपुर से डॉ. राजेश पंचोलिया का यह आलेख पढ़िए…
जयपुर। देव शास्त्र गुरु हमारे आराध्य है भगवान श्रीं आदिनाथ से लेकर भगवान श्री महावीर स्वामी तक सभी तीर्थंकरों ने केवल ज्ञान को प्राप्त कर समवशरण में दिव्य देशना दी। जिसे गणघर स्वामी के माध्यम से धर्म देशना जिनवाणी सभी तक पहुंचती थी। यह परंपरा गणघर स्वामी से लेकर अंतिम केवली जंबू स्वामी से होते हुए अनेक आचार्यों से जिनवाणी का प्रसार हुआ।
सभी समाज इसको पढ़कर धर्म लाभ ले सकें
दिगंबर आचार्य श्री घरसेन जी ने यह महसूस किया कि जिनवाणी को लिपिबद्ध होना जरूरी है ताकि आने वाले समय में सभी समाज इसको पढ़कर धर्म लाभ ले सके गुजरात गिरनार जी पर्वत पहली टोंक के पीछे सहस्त्रावन की गुफा में उन्होंने उसके लिए अपने सुयोग्य शिष्यों मुनि श्री पुष्पदंत सागर जी और मुनि श्री भूतबली सागर जी का उन्होंने चयन किया उन्हें एक-एक मंत्र जाप करने को दिया दोनों मुनियों श्री पुष्पदंत सागर और श्री भूतबली सागर ने उन मंत्रों का जब जाप किया तो एक शिष्य के सामने देवी प्रकट हुई। जिसके दांत बाहर थे, दूसरे शिष्य के सामने देवी प्रकट हुई जिसकी एक आंख नहीं थी ।दोनों मुनि समझ गए कि मंत्र कुछ अशुद्ध है। उन्होंने ध्यान से उसे मंत्र को पढ़कर उसमें व्याकरण संबंधी जो अशुद्धता थी उसे ठीक की, और उन मंत्रों का पुनः जाप किया जाप पूर्ण होने पर दोनों के समक्ष सुंदर देवियां प्रकट हुई।
जिनवाणी की शोभायात्रा निकाल पूजन करते हैं
दोनों मुनिराज श्री पुष्पदंत सागर जी और मुनि श्री भूतबली सागर जी आचार्य श्री के पास पहुंचे उन्हें पूरी घटना बताई ।तब आचार्य श्री ने बताया कि मैंने आपकी परीक्षा लेने के लिए मंत्रो में मात्रा कम या ज्यादा की थी, जिसे आपने अपनी बुद्धिमत्ता से ठीक कर मंत्र को सिद्ध किया है। दोनों शिष्यों ने षटखंडागम शास्त्र रचना की। जिस दिन शास्त्र पूर्ण हुआ वह दिन ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी का दिन था। उसी कारण समस्त आचार्यों की प्रेरणा से जैन समाज इस पावन पवित्र दिन को श्रुतपंचमी के रूप में नगर में जिनवाणी की शोभायात्रा निकाल कर उसकी पूजन करते हैं।
जिनवाणी पहली बार शास्त्र के रूप में अंकित हुई
देव शास्त्र और गुरु हमारे आराध्य है ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी जैन धर्म की पवित्र तिथि है जिस दिन जिनवाणी माता पहली बार शास्त्र के रूप में अंकित हुई। इसी कारण से श्रुतपंचमी कहा जाता है। ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी इस वर्ष 19 जून 2026 को है। जिन्होंने इन्द्रियों एवं कषायों को जीता है उन्हें जिन कहते हैं तथा जिन की वाणी (वचन) को जिनवाणी कहते है अथवा तीर्थंकरों की वाणी को जिनवाणी कहते हैं। उससे हमें धर्म का ज्ञान होता है। तीर्थंकर भगवान के वचन न्यूनता-अधिकता रहित, विपरीतता रहित, संदेह रहित होते हैं, इसलिए तीर्थंकर देव की वाणी ही जिनवाणी है। इसके अन्य नाम जिनागम, सिद्धान्त ग्रन्थ, श्रुतज्ञान, शास्त्र आदि हैं।
जिन ग्रन्थों में 63 शलाका पुरुषों के चरित्र का वर्णन
यह जिनवाणी 4 अनुयोग में विभक्त हैं- प्रथमानुयोग करणानुयोग ,चरणानुयोग द्रव्यानुयोगजिसके माध्यम से जिनवाणी को समझा जाए उसे अनुयोग कहते हैं। जिनवाणी के उपदेश की पद्धति को अनुयोग कहा जाता है। प्रथमानुयोग पढ़ने-सुनने वालों के लिये बोधि (रत्नत्रय) समाधि के निधान हो उन्हें प्रथमानयोग कहते है जिन ग्रन्थों में 63 शलाका पुरुषों के चरित्र का वर्णन किया गया हैं। जिन ग्रन्थों के पढ़ने से संसार शरीर भोगों से विरक्त्ति एवं पुण्य और पाप का ज्ञान प्रथमानुयोग शास्त्र कहलाते हैं।
प्रथमानुयोग के शास्त्र ,पद्मपुराण,आदिनाथ पुराण, हरिवंश पुराण,उत्तर पुराण ,श्रीपाल चरित्र,श्रेणिक चरित्र, पाण्डव पुराण आदि हैं। करणानुयोग-जिन ग्रन्थों मे लोक और अलोक का, षट् काल परिवर्तन, चारों गतियां तथा जीव के परिणामों का वर्णन किया गया हो उन्हें करणानुयोग कहते हैं। करणानुयोग के शास्त्र, षट्खण्डागम तिलोय पण्णत्ति,त्रिलोक सार,गोम्मटसार जीव काण्ड, गोम्मटसार कर्म काण्ड क्षपणासार, सिद्धांत सार दीपक चरणानुयोग-जिन ग्रंथों मे व्रत, समिति, गुप्ति आदि समस्त मुनि और गृहस्थों के चारित्र का स्वरूप कहा गया हो और उसका फल कहा गया हो वह चरणानुयोग के शास्त्र कहलाते हैं। चरणानुयोग के शास्त्र रयणसार, रत्नकरण्ड श्रावकाचार,सागार धर्मामृत, अमितगति श्रावकाचार वसुनन्दि श्रावकाचार ,पुरुषार्थ सिद्धिउपाय ,मूलाधार द्रव्यानुयोग- जिन ग्रन्थों में छह द्रव्य, नौ पदार्थ, पाँच आस्तिकाय, सात तत्वों का स्वरूप प्रकाशित हो उन्हें द्रव्यानुयोग के ग्रन्थ कहते हैं।
महापुरुषों के जीवन की घटनाओं का वर्णन
द्रव्यानुयोग के शास्त्र समयसार, प्रवचनसार नियमसार,पंचास्तिकाय, द्रव्यसंग्रह,तत्त्वार्थ सूत्र ,इष्टोपदेश आदि सच्चे शास्त्र का स्वरूप आप्त अर्थात वीतरागी, सर्वज्ञ और हितोपदेशी का कहा हुआ हो, तत्वों का सही निरूपण करने वाला हो,प्राणी मात्र का कल्याणकारक हो,अहिंसा का उपदेश देने वाला हो,मिध्या मार्ग का खण्डन करने वाला हो। वादी-प्रतिवादी के खण्डन से रहित हो। चरित्र और पुराण में अन्तर जिसमें किसी एक महापुरुष के जीवन सम्बन्धी उल्लेख होता है, उसे चरित्र कहते हैं और जिसमें अनेक महापुरुषों के जीवन की घटनाओं का वर्णन होता है, उसे पुराण कहते हैं।
सांसारिक उत्पातों को जीतकर तीनों लोकों में वंदनीय होते हैं
विशेष : जिनवाणी हमेशा ऊँचे आसन, ऊँचे हाथ पर रखना चाहिए तथा पैर पर नहीं रखना चाहिए। जिनवाणी पढ़ने से बुद्धि का विकास होता है एवं अच्छे-बुरे कार्यों का ज्ञान होने से दोष का त्याग और गुणग्रहण का भाव होता है।हमें सर्वप्रथम प्रथमानुयोग के ग्रन्थ पद्मपुराण (जैन रामायण) हरिवंश पुराण (जैन महाभारत), आदिनाथ पुराण, महावीर पुराण आदि का अध्ययन करना चाहिए। शास्त्र ज्ञान महिमा जो प्राणी अपने उद्धार के लिये व्याकुल है उन सबको धार्मिक चर्चाओं के श्रवण और मनन की ओर अपने रुचि को प्रयत्नपूर्वक बढ़ाना चाहिए। क्योंकि धर्म के तत्वों का सतत् अनुशीलन करके ही प्राणी जन्म-जरा-मरण आदि समस्त सांसारिक उत्पातों को जीतकर तीनों लोकों में वंदनीय होते हैं।
।फलतः इनके फल भी सुख, दुःख होते हैं
शास्त्र तीन प्रकार के होते हैं-कुछ शास्त्रों का श्रवण और मनन धार्मिक प्रवृत्ति को आगे बढ़ाता है। कुछ शास्त्रों पर आस्था करने से आत्मा की पाप प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन मिलता है। कुछ शास्त्रों के पठन-पाठन से मनुष्य को पुण्य-पापमय मिश्र चेष्टाएँ करने का भाव होता है।फलतः क्रमशः इनके फल भी सुख, दुःख होते हैं।
साधुओं की शुभ भावना से असंभव कार्य संभव हुआ
वात्सल्य वारिधी पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज द्वारा 24 फरवरी फागुन शुक्ला 8 सन 1969 मुनि दीक्षा लेने के मात्र तीन माह के भीतर उनकी नेत्रज्योति ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी 19 मई 1969 को जयपुर नसिया खनिया में अपने आप चली गई थी। किंतु उसी दिन श्रुतपंचमी पर आत्मा प्रकाशवान हो गई। इस तिथि पर नेत्र ज्योति जाने के बाद जो प्रभु का चमत्कार हुआ, जो शांति भक्ति स्रोत के पाठ से ,भगवान श्री चन्द्र प्रभ के आशीर्वाद , दीक्षागुरु आचार्य श्री धर्मसागर जी, श्री श्रुत सागर जी , श्री अजित सागर जी ,श्री अभिनंदन सागर जी मुनि श्री संभव सागर जी, श्री ज्ञानमती माताजी, आर्यिका श्री विशुद्ध मति जी सहित 47 साधुओं की शुभ भावना से असंभव कार्य संभव हुआ। नव दीक्षित 19 वर्षीय युवा दिगंबर मुनि श्री वर्धमान सागर जी की नेत्र ज्योति 52 घंटे बाद प्रभु भक्ति से बिना चिकित्सा के वापस आई। जैन धर्म का महत्व विश्व के पटल पर सामने आया और यह तिथि इतिहास में अंकित हो गई है।
जैन धर्म के महत्व को सभी को समझना चाहिए
वर्तमान प्रत्यक्षदर्शी वर्तमान में स्वयं आचार्य श्री वर्धमान सागर जी, महाराज गणनी प्रमुख 90 वर्षीय आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी सहित अन्य साधु और पीठाधीश श्री रविंद्र कीर्ति जी वर्तमान में इस घटना के साक्षी हैं। इनके सहित जयपुर के सैकडों व्यक्ति आज भी विद्यमान हैं। जिन्होंने इस घटना को अपनी आंखों से देखा है इस चमत्कार को देख है। जैन धर्म के महत्व को सभी को समझना चाहिए कि आज भी इसमें श्रद्धा और भक्ति से पाठ किया जाए तो उसका लाभ निश्चित मिलता है। जो भी भक्त पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के दर्शन करता है देवता प्रदत्त उस नेत्र ज्योति से जो वात्सल्य मिलता है आशीर्वाद मिलता हैं उस अनुभूति को भक्त जिंदगी भर नहीं भूल पाते हैं।













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