चन्द्र प्रभ जिनालय प्रबंध समिति बड़ के बालाजी ने वर्ष 2026 के चातुर्मास के लिए आचार्य श्री वर्धमान सागर जी को श्रीफल भेंट किया है। आचार्य श्री शशांक सागर जी चरण वंदना के लिए पहुंचे। जयपुर से डॉ. राजेश पंचोलिया की रिपोर्ट…
जयपुर। चन्द्र प्रभ जिनालय प्रबंध समिति बड़ के बालाजी ने वर्ष 2026 के चातुर्मास के लिए श्रीफल भेंट किया है। आचार्य श्री शशांक सागर जी की चरण वंदना के लिए पहुंचे। गणिनी आर्यिका श्री सुपार्श्व मति माताजी की समाधि स्थल चंद्रपुरी बड़ के बालाजी श्री चंद्रप्रभ जिनालय में संघ सहित विराजित आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज जी को सुनीता चुड़ीवाल एवं परिजनों ने संघ सहित वर्ष 2026 के चातुर्मास का निवेदन किया।आचार्य श्री वर्धमान सागर जी की चरण वंदना के लिए आचार्य श्री शशांकसागर जी संघ सहित पधारे। मुनि श्री हितेंद्र सागर जी सहित साधुओं एवं सुनीता भागचंद चुड़ीवाल ने आचार्य श्री शशांक सागर जी की अगवानी की। आचार्य श्री शशांक सागर जी ने आचार्य श्री वर्धमान सागर जी की 3 परिक्रमा कर चरण वंदना प्रक्षालन किए।

प्रातःकालीन उपदेश में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने आचार्य परमेष्ठि के 36 मूल गुणों की विवेचना में बताया कि आचार्य परमेष्ठी 12 तप, 10 धर्म, 5 पंचाचार, 6 आवश्यक और तीन गुप्ति का पालन करते हैं। 12 तप के बारे में बताया कि अनशन अर्थात निर्जल उपवास करना, उनोदर भूख से कम आहार लेना, व्रत परिसंख्यान में आहार के लिए विधि लेकर जाना, विधि नहीं मिलने पर उपवास करना है। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने बताया कि प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी ने शीत काल ठंड के दिनों में गीले कपड़े से पडगाहन की विधि ग्वालियर में ली और उसी दिन विधि मिली। मिट्टी के कलश पर श्रीफल से पड़गाहन की विधि 8 दिन बाद मिली। आचार्य श्री ने स्वयं के संस्मरण में बताया कि एक बार दो मौसंबी के पड़गाहन की विधि 3 दिन नहीं मिलने से 3 उपवास लगातार हुए।
6 प्रकार के रस होते हैं। नीरस अर्थात 6 रसों का उस दिन त्याग या आंशिक रस का परित्याग, विविक्त शय्यासन, कायक्लेश, पायश्चित, विनय, वैय्यावृत्ति, स्वाध्याय,व्युत्सर्ग ओर ध्यान के बारे में विस्तृत उपदेश दिया। सुरेश सबलावत, भागचंद चुड़ीवाल के अनुसार आचार्य श्री ने दस धर्म की विवेचना में उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, सत्य शौच, संयम तप, त्याग आकिञ्चन उत्तम ब्रह्मचर्य की व्याख्या की। पाँच पंचाचार में दर्शनाचार, ज्ञानाचार, तपाचार,चारित्राचार और वीर्याचार के बाद षट् आवश्यक समता, वंदना,स्तुति. प्रतिक्रमण. प्रत्याख्यान ओर कायोत्सर्ग का बताया। मनोगुप्ति, वचनगुप्ति, कायगुप्ति कुल 36 मूलगुण के बाद जो संघ में रहकर स्वयं पढ़ते हैं और अन्य मुनिगणों को पढ़ाते हैं, उन्हें उपाध्याय परमेष्ठी कहते हैं। जिनेन्द्र द्वारा प्रतिपादित जिनवाणी को विद्वानों ने स्वाध्याय कहा है। जो उस स्वाध्याय का उपदेश देते हैं। वह उपाध्याय कहलाते हैं। उनके 25 मूल गुण होते हैं। जिसमें 11 अंग और 14 पूर्व के भेद सहित 25 मूलगुण होते हैं।













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