यूं तो पूरे विश्व में जैन धर्म के अनुयायी और श्रावक निवास करते हैं, लेकिन पड़ोसी देश पाकिस्तान में प्राचीन जैन मंदिरों की अकूत संपदा विद्यमान है। यहां पर इन वीरान मंदिरों की देखरेख और संरक्षण वहां की सरकार कर रही है। सबसे आश्चर्यजनक जानकारी यह है कि नागरपारकर के सांस्कृतिक परिदृश्य को 2016 में यूनेस्को की संभावित विश्व धरोहर सूची में शामिल किया जा चुका है। श्रीफल जैन न्यूज ने यह जानकारी जुटाई और इसे संकलित और संपादित किया उपसंपादक प्रीतम लखवाल ने…
इंदौर। यूं तो पूरे विश्व में जैन धर्म के अनुयायी और श्रावक निवास करते हैं, लेकिन पड़ोसी देश पाकिस्तान में प्राचीन जैन मंदिरों की अकूत संपदा विद्यमान है। यहां पर इन वीरान मंदिरों की देखरेख और संरक्षण वहां की सरकार कर रही है। सबसे आश्चर्यजनक जानकारी यह है कि नागरपारकर के सांस्कृतिक परिदृश्य को 2016 में यूनेस्को की संभावित विश्व धरोहर सूची में शामिल किया जा चुका है। श्रीफल जैन न्यूज ने यह जानकारी जुटाई और इसे संकलित किया। प्राप्त सूचनाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि पाकिस्तान में प्राचीन जैन मंदिर मौजूद हैं। 1947 के विभाजन के समय यहां की अधिकांश जैन आबादी भारत आ गई, जिसके कारण ये मंदिर लंबे समय तक उपेक्षित और वीरान रहे। हाल के वर्षों में और स्थानीय सरकारों ने इन धरोहरों के संरक्षण और जीर्णाेद्धार का काम शुरू किया है।
कहाँ और कितने जैन मंदिर हैं?
पाकिस्तान में प्रमुख रूप से लगभग 40 ऐतिहासिक जैन स्थल और मंदिर अलग-अलग अवस्थाओं में बिखरे हुए हैं। सिंध प्रांत पाकिस्तान के थार पारकर जिले का नागरपारकर इलाका जैन इतिहास का सबसे बड़ा केंद्र है। यहां मुख्य रूप से 6 से अधिक प्रसिद्ध मंदिर हैं। गोरी जैन मंदिर यह यहां का सबसे प्रसिद्ध और भव्य मंदिर है, जो भगवान पार्श्वनाथ को समर्पित है। भोडेसर जैन मंदिर कारूंझर पहाड़ियों की तलहटी में स्थित तीन प्राचीन मंदिरों का समूह है। नागरपारकर बाजार मंदिर और वीरावाह जैन मंदिर, पंजाब प्रांत लाहौर के अनारकली चौराहे के पास स्थित प्रसिद्ध जैन मंदिर, जिसे 1992 में आंशिक रूप से क्षति पहुंचाई गई थी, अब कोर्ट के आदेश के बाद सरकार ने पुनः पुनर्निर्मित किया है। गुजरांवाला में महान जैन आचार्य विजयानंद सूरीश्वर जी (आचार्य आत्माराम जी) की ऐतिहासिक समाधि और मंदिर है। मुल्तान में लगभग 170 साल पुराना पार्श्वनाथ जैन श्वेतांबर मंदिर अपनी खूबसूरत लघु चित्रकारी के लिए जाना जाता है।
जैन मंदिरों का पुरातात्विक महत्व
इन मंदिरों का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व अत्यधिक है। वास्तुकला का चरम है। नागरपारकर के मंदिर 12वीं से 15वीं शताब्दी के बीच के हैं, जो जैन स्थापत्य कला के स्वर्ण काल को दर्शाते हैं। इनकी बनावट भारत के माउंट आबू दिलवाड़ा मंदिर से काफी मेल खाती है। दुनिया के सबसे पुराने भित्तिचित्र हैं। जो गोरी मंदिर के गुंबदों पर बने रंगीन भित्तिचित्र उपमहाद्वीप के उत्तरी हिस्से में जैन धर्म के सबसे प्राचीन जीवित भित्तिचित्र माने जाते हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार नागरपारकर के सांस्कृतिक परिदृश्य को 2016 में यूनेस्को की संभावित विश्व धरोहर सूची में शामिल किया जा चुका है। मुल्तान और पंजाब के मंदिरों में जैन शैली के साथ-साथ मुगल और सिख वास्तुकला का अनूठा मिश्रण देखने को मिलता है।
श्रद्धालु अब भी दर्शन, पूजन और अभिषेक कर सकते हैं?
व्यावहारिक रूप से, इन मंदिरों में नियमित दैनिक पूजन, अभिषेक या आरती नहीं होती है, क्योंकि वहां स्थानीय स्तर पर अब कोई जैन आबादी (श्रावक) निवास नहीं करती है। अधिकांश मंदिर परित्यक्त या पुरातात्विक स्मारकों के रूप में संरक्षित हैं। भारतीय और वैश्विक श्रद्धालु विशेष वीज़ा या अनुमति लेकर दर्शन के लिए यहां जा सकते हैं। वर्ष 2023 में इतिहास रचते हुए विभाजन के 75 साल बाद पहली बार जैन संत आचार्य धर्मधुरंधर सूरीश्वर जी महाराज ने पाकिस्तान की यात्रा की और इन प्राचीन मंदिरों में जाकर शांति संदेश के साथ विशेष पूजा-अर्चना की थी। नेहरू-लियाकत समझौते के तहत भारत से हिंदुओं और सिखों के जत्थे तो पाकिस्तान के धार्मिक स्थलों कटासराज जाते हैं, लेकिन जैन समुदाय के लिए ऐसा कोई आधिकारिक नियमित जत्था का प्रावधान अलग से नहीं है। इसके लिए भारत के जैन संगठन सरकार से लगातार मांग कर रहे हैं ताकि कॉरिडोर या नियमित धार्मिक पर्यटन शुरू हो सके।













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