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सुख और दु:ख कर्मों के अधीन है : आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने अक्षय तृतीया और दान दिवस का महत्व बताया


आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने धर्म देशना देते हुए कहा कि अक्षय तृतीया पर आहार दान देने से प्राप्त पुण्य भी अक्षय होता है। आहार दान में चारों दान शामिल होते हैं। जयपुर से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर…


जयपुर। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज श्याम नगर जयपुर में संघ सहित विराजित हैं। रविवार को उपदेश में बताया कि सुख और दु:ख कर्मों के अधीन हैं। मनुष्य जन्म तीर्थंकरों का जैन कुल है। जिसमें आपने धर्म प्राप्त किया। जन्म और मृत्यु आयु कर्म अनुसार होती हैं। आत्म हत्या गलत है। इस कारण अगले जन्म में आयु कम होती है। श्री ऋषभदेव महा मुनिराज ने 6 माह तक योग धारण कर उपवास किया। उसके बाद भ्रमण कर हस्तिनापुर में 6 माह के बाद अक्षय तृतीया पर राजा श्रेयांश ने पिछले जन्म के स्मृति जाति स्मरण होने पर नवधाभक्ति पूर्वकआहारदान दिया। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने श्याम नगर प्रवचन में बताया कि प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी महाराज ने जब सन 1915 में क्षुल्लक दीक्षा धारण की तो श्रावकों को नवधा भक्ति का ज्ञान नहीं होने से कई दिनों तक उन्हें भी आहार नहीं मिला। आचार्य श्री शांतिसागर जी का दूध रस के अतिरिक्त अन्य पांच रसों का त्याग था। सुरेश सबलावत और राजेश सेठी के अनुसार आचार्य श्री ने आगे प्रवचन में बताया कि तीर्थंकर भगवान धर्मतीर्थ का प्रवर्तन करते हैं। उसी प्रकार राजा श्रेयांश ने प्रथम तीर्थंकर महा मुनिराज को दान देकर दान तीर्थ का प्रवर्तन किया। धर्म कार्य के पुण्य से भौतिक सुख समृद्धि सुख शांति प्राप्त होती है। धन की तीन गति होती है दान करो, उपभोग करो या नष्ट होता है। अक्षय तृतीया पर आहार दान का पुण्य भी अक्षय होता है जिनालय बनाना ,शास्त्र दान, शास्त्र छपवाना से भी ज्यादा महत्वपूर्ण आहार दान है क्योंकि इस आहार दान अभय दान, औषधि दान,शास्त्र दान सभी दान शामिल होते हैं। इसलिए दान का महत्व समझकर दान देकर मनुष्य जीवन को सार्थक करने का प्रयास करें।

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