जैन धर्म के 21वें तीर्थंकर, भगवान नमिनाथ जी का मोक्ष कल्याणक वैशाख कृष्ण चतुर्दशी के पावन अवसर पर संपूर्ण विश्व के दिगंबर जैन समाज द्वारा अगाध श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल का यह संकलित और संपादित आलेख…
इंदौर। जैन धर्म के 21वें तीर्थंकर, भगवान नमिनाथ जी का मोक्ष कल्याणक वैशाख कृष्ण चतुर्दशी के पावन अवसर पर संपूर्ण विश्व के दिगंबर जैन समाज द्वारा अगाध श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यह दिन मात्र एक तिथि नहीं, बल्कि आत्मा के परमात्मा बनने और सांसारिक बंधनों से पूर्ण मुक्ति के महामहोत्सव का प्रतीक है। मिथिलापुरी के राजकुल में जन्मे भगवान नमिनाथ जी ने राजसी सुखों का त्याग कर आत्म-कल्याण का मार्ग चुना। उनके जीवन का दर्शन अत्यंत सौम्य और प्रभावी था। जैन पुराणों के अनुसार, जब उन्होंने दीक्षा ली तो हजारों राजाओं ने उनके साथ संसार का मोह त्याग दिया था। अश्वत्थ वृक्ष के नीचे घोर तपस्या करते हुए उन्होंने चार घातीय कर्मों का क्षय किया और केवलज्ञान (अनंत ज्ञान) प्राप्त किया। उनकी देशना (उपदेश) समवशरण में गूंजी, जहां उन्होंने जीव मात्र के प्रति दया और अपरिग्रह का संदेश दिया। अंततः श्री सम्मेद शिखर जी की पावन चोटी पर ध्यानस्थ होकर वैशाख कृष्ण चतुर्दशी के दिन उन्होंने सिद्ध पद प्राप्त किया और पंचम गति (मोक्ष) को प्राप्त हुए।
भक्ति और अनुष्ठानरू मंदिरों में उमड़ता श्रद्धा का सैलाब
भगवान नमिनाथ जी के मोक्ष कल्याणक पर इंदौर, जयपुर, दिल्ली और श्रवणबेलगोला सहित देशभर के दिगंबर जैन मंदिरों व चैत्यालयों में वातावरण भक्तिमय हो जाता है। उत्सव की शुरुआत ब्रह्ममुहूर्त में प्रभु के अभिषेक और शांतिधारा से होती है। भक्तगण सामूहिक रूप से अष्टद्रव्य से पूजन करते हैं। ‘नमिनाथ प्रभु के चरणों में शीश झुकाने आए है’ जैसे भजनों से मंदिर गुंजायमान रहते हैं। इस दिन का मुख्य आकर्षण निर्वाण लाडू चढ़ाना है। शुद्ध घी और मेवों से बना यह लाडू प्रभु की मुक्ति की स्मृति में अर्पित किया जाता है। लाडू चढ़ाते समय भक्त विशेष निर्वाण कांड और निर्वाण पाठ का पठन करते हैं जो आत्मा की शुद्धता का संकल्प दिलाता है। कई स्थानों पर नमिनाथ विधान का आयोजन होता है, जिसमें मंडल विधान के माध्यम से प्रभु के गुणों का स्तवन किया जाता है।
प्रभु का संदेशः संयम ही सुख का मार्ग है
भगवान नमिनाथ जी का जीवन हमें सिखाता है कि शक्ति का असली प्रदर्शन युद्ध में नहीं, बल्कि अपनी इंद्रियों को जीतने में है। उन्होंने सिखाया कि बाहरी विजय क्षणभंगुर है, जबकि आंतरिक विजय (आत्म-विजय) शाश्वत है। जैसे अग्नि काठ को जलाकर भस्म कर देती है, वैसे ही तपस्या आत्मा के पुराने कर्मों को जलाकर उसे कुंदन बना देती है। इंदौर जैसे प्रमुख जैन केंद्रों में इस अवसर पर शोभायात्राएं निकाली जाती हैं और संतों के सानिध्य में तत्व चर्चा होती है। समाज के युवा और बुजुर्ग मिलकर संकल्प लेते हैं कि वे प्रभु के बताए अहिंसा परमो धर्मः के मार्ग पर चलेंगे और अपने जीवन में नैतिकता व सादगी को स्थान देंगे। 16 अप्रैल (वैशाख कृष्ण चतुर्दशी) का यह दिन हमें याद दिलाता है कि मानव जन्म का अंतिम लक्ष्य मोक्ष ही है। भगवान नमिनाथ जी के चरणों में निर्वाण लाडू अर्पित करना केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि इस भावना का प्रतीक है कि हमारी आत्मा भी सभी विकारों से मुक्त होकर सिद्धालय में स्थान पाए। आज के भागदौड़ भरे युग में नमिनाथ प्रभु के उपदेश-शांति, धैर्य और संतोष परम आवश्यक हैं। आइए, इस मोक्ष कल्याणक पर हम अपनी बुराइयों का त्याग करें और ‘जियो और जीने दो’ के मंत्र को आत्मसात करें। जय जिनेन्द्र! भगवान नमिनाथ जी की जय!













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