आचार्य श्री वर्धमान सागर जी 10 मुनिराज, 20 आर्यिकाएं, 01 ऐलक, 3 क्षुल्लक एवं 34 साधुओं सहित जयपुर स्थित अतिशय क्षेत्र चूलगिरी राणा जी की नसियां में ग्रीष्मकालीन वाचना हेतु विराजमान हैं। नसिया के पदाधिकारियों एवं जयपुर के विभिन्न मंदिरों और कॉलोनियों के श्रद्धालु आचार्य श्री वर्धमान सागर जी से आशीर्वाद प्राप्त कर अपनी-अपनी कॉलोनियों में आगमन हेतु निवेदन कर रहे हैं। पढ़िए राजेश पंचोलिया की रिपोर्ट…
जयपुर। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी 10 मुनिराज, 20 आर्यिकाएं, 01 ऐलक, 3 क्षुल्लक एवं 34 साधुओं सहित जयपुर स्थित अतिशय क्षेत्र चूलगिरी राणा जी की नसियां में ग्रीष्मकालीन वाचना हेतु विराजमान हैं। नसिया के पदाधिकारियों एवं जयपुर के विभिन्न मंदिरों और कॉलोनियों के श्रद्धालु आचार्य श्री वर्धमान सागर जी से आशीर्वाद प्राप्त कर अपनी-अपनी कॉलोनियों में आगमन हेतु निवेदन कर रहे हैं। इसी क्रम में आज अनेक श्रद्धालुओं की उपस्थिति में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने केशलोचन किया।
केशलोचन के संबंध में संघ के श्री हितेंद्र सागर जी ने जानकारी देते हुए बताया कि प्रत्येक दिगंबर साधु को 2 से 4 माह की अवधि के भीतर केशलोचन करना अनिवार्य होता है। केशलोचन दिगंबर साधु का एक मूल गुण है, जिसके माध्यम से शरीर से राग और मोह का त्याग होता है। उन्होंने बताया कि जैन धर्म अहिंसा प्रधान धर्म है। यदि बालों का लोचन नहीं किया जाए, तो उनमें सूक्ष्म जीवों की उत्पत्ति की संभावना रहती है। जैन साधु अहिंसा धर्म के महाव्रती होते हैं, इसलिए वे इस प्रक्रिया का पालन करते हैं।

मुनि श्री ने बताया कि जैन साधु अपरिग्रही होते हैं, इसलिए वे अपने हाथों से ही केशलोचन करते हैं। केशलोचन से शरीर के प्रति ममत्व का त्याग होता है तथा इस प्रक्रिया के दौरान तप, संयम और धैर्य के साथ धर्म की प्रभावना होती है। जिस दिन जैन साधु केशलोचन करते हैं, उस दिन वे उपवास भी रखते हैं। इस अवसर पर बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे। साधुओं द्वारा वैराग्यपूर्ण स्तोत्र का वाचन भी किया गया।













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