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मंदिर में जारी मंत्र अनुष्ठान का दिखा दिव्य प्रभाव : भगवान शांतिनाथ के छत्र अपने आप हिलने लगे


नगर में चल रहे 16 दिवसीय जाप अनुष्ठान के दौरान रात्रि बेला में एक अद्भुत दृश्य देखने को मिला। भगवान 1008 श्री शांतिनाथ भगवान के ऊपर स्थापित छत्र अपने आप हिलने लगे, जिसे उपस्थित श्रद्धालुओं ने मंत्र अनुष्ठान की दिव्य ऊर्जा का प्रभाव बताया। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर…


रामगंजमंडी। नगर में चल रहे 16 दिवसीय जाप अनुष्ठान के दौरान रात्रि बेला में एक अद्भुत दृश्य देखने को मिला। भगवान 1008 श्री शांतिनाथ भगवान के ऊपर स्थापित छत्र अपने आप हिलने लगे, जिसे उपस्थित श्रद्धालुओं ने मंत्र अनुष्ठान की दिव्य ऊर्जा का प्रभाव बताया। आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज, आचार्य श्री समय सागर जी के शिष्य मुनि श्री 108 निष्पक्ष सागर जी महाराज एवं मुनि श्री 108 निस्पृह सागर जी महाराज की प्रेरणा से नगर में भगवान शांतिनाथ के समक्ष प्रतिदिन लगभग 12 घंटे का दिव्य मंत्र जाप अनुष्ठान किया जा रहा है।

इस अनुष्ठान में नगर के युवा, बच्चे, महिलाएँ और सभी समाज बंधु बढ़-चढ़कर अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। देर रात 1 बजे तक श्रद्धालु इस पावन अनुष्ठान में मंत्र जाप कर अपनी आध्यात्मिक आहुति प्रदान कर रहे हैं।

इसी दौरान रात्रि लगभग 10 बजे से 12 बजे के बीच भक्तों ने देखा कि भगवान के ऊपर स्थापित छत्र अपने आप हिलने लगे। प्रारंभ में कुछ लोगों को विश्वास नहीं हुआ और यह अनुमान लगाया गया कि शायद पंखों या हवा के कारण ऐसा हो रहा होगा लेकिन, जब मंदिर के पंखे बंद कर दिए गए, तब भी छत्र का हिलना जारी रहा।

इसके बाद वहाँ उपस्थित धर्मनिष्ठ श्रावक, हाल ही में संपन्न पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव में भगवान के पिता बनने का सौभाग्य प्राप्त करने वाले जयकुमार जैन शुद्ध वस्त्र धारण कर मंदिर के गर्भ गृह में पहुँचे। उन्होंने स्वयं इस दृश्य को करीब से देखा और उसका वीडियो भी बनाया । उन्हीं के साथ उपस्थित श्रद्धालुओं ने भी इसे स्पष्ट रूप से अनुभव किया। श्रद्धालुओं का मानना है कि जब भक्ति, आराधना और मंत्र जाप शुद्ध भावनाओं एवं दिव्य तरंगों के साथ किया जाता है तो उसका प्रभाव पंचम काल में भी प्रकट होता है। यह घटना उसी का एक जीवंत उदाहरण मानी जा रही है।

धर्मप्रेमियों का विश्वास है कि संतों का आशीर्वाद, गुरुजनों की प्रेरणा और समाज का सामूहिक सहयोग जब एक साथ जुड़ता है, तब उसकी शुद्ध ऊर्जा दिव्य प्रभाव उत्पन्न करती है। यह घटना इस बात का संकेत भी मानी जा रही है कि जिस पवित्र उद्देश्य से यह अनुष्ठान प्रारंभ हुआ है, वह निश्चित ही निर्विघ्न और अत्यंत मंगलमय रूप से संपन्न होगा।

इस प्रकार की दिव्य अनुभूतियाँ समाज में धर्म, आस्था और श्रद्धा को और अधिक सुदृढ़ करने का कार्य करती हैं।

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