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जानिए उस मंदिर की कहानी, जो है सम्मेद शिखरजी का प्रवेश द्वार: रांची के अपर बाजार स्थित 100 साल से भी पुराना दिगंबर जैन मंदिर


सारांश

अपर बाजार स्थित प्रसिद्ध दिगंबर जैन मंदिर गौरवशाली इतिहास के कालखंड में 100 वर्ष से ज्यादा पुराना है। क्यों कहते हैं इसे सम्मेद शिखरजी का प्रवेश द्वार, विस्तार से जानिए…श्रीफल न्यूज़ की जैन मंदिरों पर विशेष ऋंखला में आज राँची के दिंगम्बर मंदिर की …


राँची के अपर बाजार में बना यह मंदिर सौ साल से भी ज्यादा पुराना है । इसका निर्माण अपर बाजार के धनाढ्य व्यवसायी केदार लाल जी नंदलाल जी सरावगी परिवार के द्वारा कराया गया था। छह सालों तक व्यवस्था संभालने के बाद आठ जुलाई 1927 को मंदिर का कार्यभार जैन समाज को सौंप दिया गया।

तब से मंदिर का संचालन श्री दिंगबर जैन पंचायत द्वारा किया जा रहा है। स्थापना के इन सौ वर्षो में दिगंबर जैन मंदिर की पहचान अध्यात्म ही नहीं बल्कि समाज के प्रमुख सास्कृतिक केंद्र के रूप मे बन गई है। रांची को तीर्थराज सम्मेद शिखर का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है।

साल भर यहां जैन मुन्नियों का रहता है मंगल प्रवास

इस कारण सालों भर देशभर से जैन मुनियों का यहा प्रवास लगा रहता है। खासकर, चातुर्मास के लिए दिगंबर जैन मंदिर जैन मुनियों की पहली पसंद होती है। आचार्य सन्मति सागर जी, आचार्य कुंथु सागर जी, आचार्य ज्ञानसागर जी, मुनि श्री प्रज्ञा सागर जी आदि दर्जनों प्रख्यात साधुओं ने हाल के कुछ वर्षों में अपना चातुर्मास पूरा किया है ।कहते हैं कि करीब 18 कट्ठा में फैले मंदिर परिसर के इर्द-गिर्द ही जैन समाज पल्लवित हुआ था ।

एक सेठ के आहार नियम संकल्प की वजह से बना यह मंदिर

मंदिर के निर्माण के पीछे इंदौर के एक सेठ के आहार नियम को माना जाता है। श्री दिगंबर जैन पंचायत के मंत्री कमल जैन के अनुसार एक बार इंदौर के सेठ हुकुमचंद जी का सम्मेद शिखर जाने के क्रम में राची में रुकना हुआ। उनका नियम था कि देव दर्शन के बिना आहार ग्रहण नहीं करेंगे। उस समय अपर बाजार में कोई मंदिर नहीं था। खैर, घर में रखे भगवान के मूíत का दर्शन कर आहार तो कर लिया लेकिन मंदिर जैसी संतुष्टि नहीं मिली। कहा जाता है उन्हीं की प्रेरणा से सरावगी परिवार के द्वारा मंदिर का निर्माण कराया गया। वहीं, मंदिर में स्थापित भगवान की मूíतया विभिन्न स्थानों से खुदायी में प्राप्त हुई हैं।

मंदिर बनाने वाले सेठ जमुनादास की क्षेत्र में रही धाक

आज से करीब 150 साल पहले राजस्थान के मुकंदगढ़ से जमुनादास जी छावड़ा व्यवसाय के सिलसिले में राची आए थे। अपर बाजार में किराना दुकान से व्यवसाय आरंभ किए। इसके बाद जोधराज कस्तूरचंद, जोखीराम मुंगराज, बैजनाथ मुंगराज, रतन लाल सूरजमल का परिवार राजस्थान से राची पहुंचे।

जमुनादास की ऐसी धाक थी कि अंग्रेज भी करते थे परहेज

जमुनादास छावड़ा की चौथी पीढ़ी राची में हैं। कहते हैं कि कई अंग्रेज अधिकारी उनके परदादा की दुकान से सामान लेने आते थे। जब अंग्रेजों को यह पता चला कि वे शाकाहारी हैं तो सामान छूना तो दूर दुकान में पैर भी नहीं रखते थे। जो सामान चाहिए होता था दूर से ही माग लेते थे।

बंगाल में खुदाई में मिले थे यहां बिराजे आदिनाथ भगवान 

बंगाल के मानभूम से खोदाई में प्राप्त हुई थी प्रतिमा मंदिर के मुख्य अर्चक अरविंद शास्त्री के अनुसार मंदिर ऐतिहासिक रूप से भी काफी महत्व रखता है। मंदिर में एक प्रतिमा जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ की है। यह पश्चिम बंगाल के मानभूम जिले से खोदाई से प्राप्त हुआ था। प्रतिमा के चारों ओर से 24 तीर्थंकर की आकृति उकेरी हुई है। 1970 के आसपास अपरबाजार निवासी छगन लाल सरावगी के प्रयास से यह प्रतिमा मंदिर में स्थापित किया गया।

आप के आस -पास भी कोई प्राचीन जैनमंदिर हो और उसका कोई अतिशय हो तो हमें बताएं । व्हाट्सएप नंबर 9591952436 

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