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विनाश मानव पर छाता है, तब विवेक मर जाता है: मुनिश्री विलोकसागर ने कर्म फल और पुण्य की व्याख्या की 


मुनि श्री विलोक सागर महाराज बड़े जैन मंदिर में इन दिनों विराजित हैं। यहां उनकी धर्म देशना में रोज बढ़ी संख्या में समाजजन एकत्र हो रहे हैं। गुरुवार को मुनिश्री विलोकसागर ने धर्मसभा में कहा कि इस असार संसार में सभी प्राणी अपने पाप पुण्य के अनुसार सुख और दुख भोगते हैं। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर…


मुरैना। मुनि श्री विलोक सागर महाराज बड़े जैन मंदिर में इन दिनों विराजित हैं। यहां उनकी धर्म देशना में रोज बढ़ी संख्या में समाजजन एकत्र हो रहे हैं। गुरुवार को मुनिश्री विलोकसागर ने धर्मसभा में कहा कि इस असार संसार में सभी प्राणी अपने पाप पुण्य के अनुसार सुख और दुख भोगते हैं। जब व्यक्ति का पुण्य कर्म का उदय होता है तो वह मिट्टी उठाता है तो वो सोना हो जाती है लेकिन, यदि उसके पाप कर्म उदय होता है तो सोना भी मिट्टी बन जाता है।

पुण्य के उदय में व्यक्ति ऊपर उठता है

मुनिश्री ने कहा कि पुण्य के उदय में व्यक्ति ऊपर उठता है तो वहीं पाप के उदय में गर्त में चला जाता है। उन्होंने कहा कि विनाश मानव पर छाता है, तब विवेक स्वयं मर जाता है। पाप के उदय में प्राणी हित और अहित भूल जाता है, अपने और पराए की परख नहीं कर पाता। ये कषाय ही हमारे सुख दुख का कारक हैं। कषाय का आवेग जब आता है, तब सबकुछ तहस-नहस हो जाता है। कषाय के आवेग में व्यक्ति की बुद्धि नष्ट हो जाती है, वो अच्छा बुरा सब कुछ भूल जाता है। उन्होंने आगे कहा कि व्यक्ति कितना भी पढ़ा लिखा हो, ज्ञानी हो ऐसे में वह अज्ञानी बन जाता है। वह अपना होश खो बैठता है।

…अंत में रावण मृत्यु को प्राप्त हुआ

मुनिश्री ने कर्मों की परिभाषा समझाते हुए कहा कि रावण एक प्रकांड विद्वान था, वो तीन खंड का राजा था लेकिन, कर्मों के मार से वो भी नहीं बच सका। कर्म के उदय में आने पर रावण ने सीता का अपहरण किया। कर्माेदय के कारण रावण की मति भ्रष्ट हो गई और वो राम से युद्ध कर बैठा क्योंकि उस समय रावण की मति मारी गई थी, उसके सोचने-समझने, हित और अहित को जानने, अपने और पराए को समझने की शक्ति क्षीर्ण हो चुकी थी, अंत में रावण मृत्यु को प्राप्त हुआ।

पुण्य कर्म से सुख और पाप कर्म से दुख मिलता है

मुनिश्री कहते हैं कि मनुष्य अपने जीवन में अनेक प्रकार से पुण्य का उपार्जन करके मोक्ष के मार्ग की ओर आगे बढ़ सकता है। मनुष्य पर्याय, श्रेष्ठ कुल, बुद्धि, धन, जैन धर्म, साधु-संतों का समागम, उनका चातुर्मास यह सब पूर्व में किए हुए सत्कार्य एवं पुण्य के फल स्वरूप ही हमें प्राप्त होता है। जो हमें पुण्य से प्राप्त हुआ है, उसका सदुपयोग करना चाहिए। हम सभी को अपनी चंचला लक्ष्मी को परोपकारी और धार्मिक कार्यों में खर्च कर अपने लिए और अधिक पुण्य का संचय करना चाहिए। धार्मिक अनुष्ठान, पूजन पाठ, जप, तप करते हुए अपनी आत्मा का कल्याण करना चाहिए क्योंकि, जीवन में अंतिम सांस का कोई ठिकाना नहीं है। कभी भी बुलावा आ सकता है, सब यहीं का यहीं धरा रह जाएगा। यहां से जाना कभी भी हो सकता है। जब व्यक्ति के जीवन में पुण्य का उदय आता है, तो अमंगल ही मंगल होता है। पापों के उदय से अमीर भी दरिद्र और आस्तिक भी नास्तिक हो जाता है। कर्मों की लीला बड़ी विचित्र है, यह राजा को रंक और रंक को राजा बना सकती है।

व्यक्ति नम्रता से जुड़ता है और अहंकार से टूटता है

मानव पर्याय पाकर भी हम अहंकार में सबकुछ नष्ट कर देते हैं। व्यक्ति नम्रता से जुड़ता है और अहंकार से टूटता है। अहंकार रूपी तलवार से जीवन समाप्त हो जाता है, जीवन की शांति, सुख, चौन सब समाप्त हो जाता है। सदैव अच्छाई का रास्ता अपने पास रखो। आज मानव का स्वभाव बुराई को याद रखने का हो गया है, अच्छाई को वह भूलता जा रहा है। जीवन में नकारात्मक सोच विचार मनुष्य को नुकसान पहुंचाते है। अन्य द्वारा किए गए उपकार को याद रखना चाहिए। अन्य के दोष को देखने के पूर्व स्वयं के दोष को देखे। कभी भी पूर्व में की गई गलतियों को दोहराना नहीं चाहिए, बल्कि उनसे सबक सीखना चाहिए। मुनिश्री ने कहा कि हे! भव्य आत्माओं अपने जीवन में अहंकार का त्याग करते हुए नम्रता को धारण कर आत्मीय सुख-शांति के साथ प्रभु का स्मरण करते हुए परोपकार, जीवदया, अहिंसा, मानव सेवा में लीन रहना चाहिए।

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