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हम सुख की कामना करते हैं यहीं हमारी यात्रा पूरी हो जाती है : मुनिश्री अविचल सागर जी महाराज के मंगल आशीर्वचनों का मिला लाभ


देवताओं द्वारा जिनके लिए दिव्य सिंहासन स्थापित किया गया है। जिसके लिए विशेष रत्नों से धर्म सभा का निर्माण किया गया था। ऐसे महाप्रभु से भी हम अपने सुख की कामना करते हैं। यह उद्गार सुभाषगंज में धर्मसभा में मुनिश्री अविचल सागर जी महाराज ने व्यक्त किए। अशोक नगर से पढ़िए, यह खबर…


अशोक नगर। देवताओं द्वारा जिनके लिए दिव्य सिंहासन स्थापित किया गया है। जिसके लिए विशेष रत्नों से धर्म सभा का निर्माण किया गया था। ऐसे महाप्रभु से भी हम अपने सुख की कामना करते हैं। यह उद्गार सुभाषगंज में धर्मसभा में मुनिश्री अविचल सागर जी महाराज ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि हर पवित्र स्थल पर पहुंचकर भी हमारी खोज सुख पर जाकर पूरी हो जाती है। किसी भी महा पुरुष को नमस्कार करना, वंदन करना, उनके चरणों में बैठना बहुत आसान होता है। उनके चरणों में बैठकर मेरी आधी व्याधि संकट दूर हो मुझे सुख मिले। मेरे विचारों की अभिलाषा की पूर्ति हो, ये हमारे स्वयं की इच्छा है। ये मन को अच्छा लगता है। थोड़ा स्तोत्र पढ़ लो। थोड़ी वंदना दर्शन कर लो तो पाप कट जाएंगे।

पंद्रह आर्यिका माता जी का हुआ नगर प्रवेश

मंत्री विजय धुर्रा ने कहा कि गणनी आर्यिका रत्न श्री विशाश्री माता ससंघ 15 आर्यिका माताजी बड़नगर से पद विहार करते हुए अशोक नगर पधार रही है। गत दिवस राजपुर पहुंच कर जैन समाज अध्यक्ष राकेश कांसल, उपाध्यक्ष अजित बरोदिया,महामंत्री राकेश अमरोद, कोषाध्यक्ष सुनील अखाई, संयोजक उमेश सिंघई सहित अन्य भक्तों ने श्रीफल भेंटकर अशोक नगर पधारने का निवेदन किया है। माता जी का मंगल प्रवेश श्री शांतिनाथ त्रिकाल चौबीस जिनालय शांतिनगर मंदिर में हुआ। गुरुदेव की प्रेरणा से संचालित आचार्य श्री विद्यासागर गौ चिकित्सालय में एक्स-रे मशीन स्थापित हो रही है। आचार्य के सान्निध्य में हम इसे बहुत शीघ्र गौ चिकित्सालय में समारोह पूर्वक स्थापित करने जा रहे हैं।

आप अपने मन का निर्माण करें

आचार्य श्री ने कहा कि विश्व में लाखों लोग नियम धर्म पूजा पाठ स्तोत्र सब एक जैसे ही करते हैं। धर्म करने का तरीका लगभग एक सा होता है। जिससे पुण्य की प्राप्ति होती है। इसमें आपको मन लग जाता है फिर भी सबको अलग-अलग फल की प्राप्ति होती है। ऐसा क्यों होता है? आपने कभी विचार किया। उपदेश भी कहते है कि आपका मन लगना चाहिए। इससे कोई बहुत बड़ी उपलब्धि होने वाली नहीं है। ये बहुत छोटी सी साधना है इसकी कोई उपलब्धि नहीं है। ये मन का भ्रम है, माया जाल है। सामाने वाला इससे बस उलझता रहता है। इससे मुझे एक प्रतिशत भी बेनिफिट मिलने वाला नहीं है। इसलिए मैं मन लगाने की कोशिश नहीं करता। मैं जाप करता हूं स्तुति करना, ध्यान करना प्रभु की इच्छा है कि आप अपने मन का निर्माण करे।

एक ऐसा मन हमें निर्माण करना है। जिसे दया करना क्षमा करना आना चाहिए। हमारा मन संयमित हो हमें एक ऐसे मन निमार्ण करना है। जो ये कहे कि ये सब कुछ मेरा नहीं है। क्षमावान मन बनने के लिए अलग से बैठना पड़ता है अपने भाग्य को बनने के लिए अपने मन में स्वप्न देखना चाहिए।

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