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पुण्य-पाप का संबंध व्यक्ति के विचार आचरण से है: दो दिवसीय भक्तामर पाठ का हुआ समापन 


नगर में विगत 14 वर्ष से 24 घंटे का भक्तामर पाठ चल रहा है। इस साल 19 और 20 जुलाई को यह आयोजन अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज के सानिध्य में गोकुल नगर जैन मंदिर में हुआ। यह आयोजन 14 साल से सृजन ग्रुप कर रहा है। जिसमें लोगों की उपस्थिति साक्षात और झूम द्वारा रहती है। इस बार के प्रायोजक चंद्रकांता, जितेन्द्र, मोनिका जैन थे। इंदौर से पढ़िए, यह खबर…


इंदौर। नगर में विगत 14 वर्ष से 24 घंटे का भक्तामर पाठ चल रहा है। इस साल 19 और 20 जुलाई को यह आयोजन अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज के सानिध्य में गोकुल नगर जैन मंदिर में हुआ। यह आयोजन 14 साल से सृजन ग्रुप कर रहा है। जिसमें लोगों की उपस्थिति साक्षात और झूम द्वारा रहती है। इस बार के प्रायोजक चंद्रकांता, जितेन्द्र, मोनिका जैन थे।

उनका स्वागत सृजन ग्रुप के अध्यक्ष विशाल धनोते, पोरवाड़ समाज के अध्यक्ष नमीष जैन द्वारा किया गया। 19 को कार्यक्रम का प्रारंभ दीप प्रज्वलन पोरवाड़ समाज अध्यक्ष नमीष जैन, सचिव श्रेष्ठि जैन, गोकुल नगर समाज अध्यक्ष एसके सिंघई एवं सृजन ग्रुप अध्यक्ष विशाल धनोते और स्वागत गीत ज्ञान दीप महिला मंडल गोकुल नगर द्वारा किया गया। 20 जुलाई को पाठ का समापन भक्तामर आराधना के साथ हुआ।

जो 48 दीपकों के साथ मुनिश्री पूज्यसागर जी के मुखारबिंद से मंत्रोच्चार द्वारा की गई। तत्पश्चात सभी लोगों द्वारा महाआरती बड़ी भक्ति भाव से की गई। कार्यक्रम में फेडरेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष मनोहर झांझरी, वार्ड 50 पार्षद राजीव जैन, डीके जैन केच, जेनेश झांझरी, सुदीप जैन, अनिल जेनको, अजय जैन सांसद प्रतिनिधि, जीतेन्द्र जैन, भरत जैन, श्रीपाल जैन, विनोद जैन, रविंद्र जैन, मनीष जैन उपस्थित थे।

विचारों से भी पुण्य-पाप का बंधन होता है

मुनिश्री पूज्य सागरजी महाराज ने कहा कि पुण्य-पाप का संबंध व्यक्ति के विचार, भाव, दृष्टि, सोच और आचरण से है। इन्हीं के अनुसार श्रावक के जीवन में पुण्य और पाप का बंधन होता है और यही तय करते हैं कि जीवन में सुख आएगा या दुःख। पाप को केवल मंदिर या धार्मिक स्थलों से जोड़ना उचित नहीं है। व्यवहारिक जीवन में होने वाली हर क्रिया और विचारों से भी पुण्य-पाप का बंधन होता है।

कर्म सिद्धांत का यह स्पष्ट नियम है कि दूसरे क्या करते हैं, इसका आपके पुण्य-पाप से कोई संबंध नहीं। बल्कि आप दूसरों के बारे में क्या सोचते हैं और आपका स्वयं का आचरण कैसा है, यही आपके पुण्य और पाप का निर्धारण करता है। आप में जो यह आयोजन किया हैै। इससे अनेक लोग पुण्य के कार्य से जुड़े हैं।

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