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गणाचार्य श्री 108 विराग सागर जी महाराज का तृतीय समाधि दिवस : 44 वर्षों के संयमकाल में 350 से अधिक दीक्षाओं से जगाई धर्म चेतना


गणाचार्य श्री 108 विराग सागर जी महाराज के तृतीय समाधि दिवस पर उनके तप, त्याग, साहित्य, युग-प्रतिक्रमण आंदोलन तथा 350 से अधिक साधु-साध्वियों को दीक्षा देकर जैन धर्म की प्रभावना में दिए गए अतुलनीय योगदान का स्मरण किया गया। पढ़िए श्रीफल साथी पदम जैन बिलाला की यह रिपोर्ट


जयपुर। गणाचार्य श्री 108 विराग सागर जी महाराज के तृतीय समाधि दिवस (4 जुलाई) पर देशभर में श्रद्धापूर्वक उनका स्मरण किया गया। जैन समाज ने उन्हें राष्ट्रसंत, युग-प्रतिक्रमण प्रवर्तक, वीरागोदय के प्रणेता एवं जिनशासन के तेजस्वी आचार्य के रूप में नमन करते हुए उनके तप, त्याग और धर्मप्रभावना को याद किया।

17 वर्ष की आयु में संयम पथ का चयन

2 मई 1963 को मध्यप्रदेश के दमोह जिले के पथरिया में जन्मे विराग सागर जी महाराज ने मात्र 17 वर्ष की आयु में संयम जीवन स्वीकार किया। वर्ष 1980 में क्षुल्लक दीक्षा, 1983 में मुनि दीक्षा तथा 1992 में सिद्धक्षेत्र द्रोणगिरि में आचार्य पद प्राप्त कर उन्होंने जैन धर्म की प्रभावना को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।

350 से अधिक दीक्षाओं का अद्वितीय इतिहास

44 वर्षों के संयमकाल में गणाचार्य श्री ने 350 से अधिक साधु-साध्वियों को दीक्षा प्रदान कर मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर किया। उनके विशाल संघ ने देशभर में संयम, तप, अहिंसा और धर्म के संदेश का व्यापक प्रचार-प्रसार किया।

युग-प्रतिक्रमण परंपरा को किया पुनर्जीवित

गणाचार्य श्री विराग सागर जी महाराज ने लगभग दो हजार वर्ष पुरानी युग-प्रतिक्रमण परंपरा को पुनर्जीवित करने का ऐतिहासिक कार्य किया। वर्ष 2012 में जयपुर में प्रथम युग-प्रतिक्रमण एवं यति सम्मेलन, 2017 में झांसी तथा 2023 में पथरिया में भव्य आयोजन संपन्न हुए, जिनसे जैन समाज में नई आध्यात्मिक चेतना का संचार हुआ।

साहित्य के माध्यम से भी किया धर्मप्रभावना

गणाचार्य श्री एक उत्कृष्ट चिंतक एवं साहित्यकार भी थे। उनकी प्रमुख कृतियों में शुद्धोपयोग, आगम चक्खू साहू, सम्यक दर्शन, सल्लेखना से समाधि, तीर्थंकर ऐसे बने, कर्म विज्ञान (भाग-1 एवं 2), चैतन्य चिंतन, साधना तथा आराधना जैसी महत्वपूर्ण रचनाएं शामिल हैं।

दीक्षित संत आज भी बढ़ा रहे धर्म की प्रभावना

गणाचार्य श्री द्वारा दीक्षित आचार्य श्री विमर्श सागर जी, विशुद्ध सागर जी, विशद सागर जी, विभव सागर जी, विहर्ष सागर जी, विनिश्चय सागर जी एवं विमद सागर जी सहित नौ आचार्य अपने-अपने विशाल संघों के साथ देशभर में धर्मप्रभावना का कार्य कर रहे हैं।

विराग-विशुद्ध परंपरा का विस्तार

30 अप्रैल 2025 को इंदौर में आयोजित ऐतिहासिक समारोह में आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज को पट्टाचार्य पद प्रदान किया गया। वहीं वर्ष 2026 में जयपुर में आचार्य श्री विशद सागर जी महाराज ससंघ, आर्यिका विभा श्री माताजी ससंघ एवं आर्यिका अर्हम् श्री माताजी ससंघ का चातुर्मास विराग-विशुद्ध परंपरा की धर्मधारा को निरंतर आगे बढ़ा रहा है।

श्रद्धांजलि एवं प्रेरणा

4 जुलाई 2024 को महाराष्ट्र के जालना जिले के समीप देवमूर्ति ग्राम में गणाचार्य श्री विराग सागर जी महाराज समाधिस्थ हुए। उनका तप, त्याग, संयम, साहित्य और धर्मप्रभावना आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणास्रोत रहेगा।

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