आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी महाराज ससंघ इन दिनों सुमतिनाथ जिनालय में विराजमान हैं। धर्मनगरी में उनक सानिध्य में भक्ति और ज्ञान की गंगा बह रही है। बाहुबली कॉलोनी से पढ़िए, यह खबर…
बाहुबली कॉलोनी। आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी महाराज ससंघ इन दिनों सुमतिनाथ जिनालय में विराजमान हैं। धर्मनगरी में उनक सानिध्य में भक्ति और ज्ञान की गंगा बह रही है। प्रतिदिन प्रातः 4:30 बजे उनके पावन सानिध्य में ‘दीप पूजा’ संपन्न हो रही है। जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु सहभागिता कर रहे हैं। समाज प्रवक्ता महेंद्र कवालिया ने बताया कि प्रातः कालीन प्रवचन सभा में आचार्य श्री ने ‘सत्य’ की महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सत्य केवल चर्चा का विषय नहीं है, बल्कि यह मोक्ष की सीढ़ी है।
वाणी पर नियंत्रण और आगम का महत्व
आचार्य श्री ने भक्तों को संबोधित करते हुए कहा कि बोलने से पहले विचार करना आवश्यक है। वाणी में जरा सी असावधानी और एक असत्य शब्द भी मनुष्य को भारी हानि पहुंचा सकता है। उन्होंने वाणी के तीन प्रकार स्पष्ट किए-
निजवाणी: स्वयं के विचार, जो आगम नहीं हैं।
जनवाणी: जो बहुमत या लोग कहते हैं, पर जरूरी नहीं कि वह सच हो।
जिनवाणी: जो शास्त्रों में अंकित है, वही अंतिम सत्य है।
आचार्य श्री ने जोर देकर कहा कि शास्त्र में जो लिखा है, उसे बिना तर्क के, पूर्ण श्रद्धा के साथ स्वीकार करना ही तीर्थंकर की वाणी का सम्मान है। जब तक शास्त्रों को पढ़ने और समझने की बुद्धि जागृत नहीं होगी तब तक सत्य का साक्षात्कार संभव नहीं है।
जीवन की कठिनाइयों से पार पाने का सूत्र
प्रवचन के दौरान गुरुदेव ने मानवता और प्रेम का संदेश देते हुए कहा— “प्यार परिचय को पहचान बना देता है, वीराने को गुलिस्तान बना देता है; पराया नहीं, अपनों का दर्द ही आदमी को इंसान बना देता है।” उन्होंने आज के युग का कड़वा सच बताते हुए जीवन को सुखी बनाने का मंत्र दिया-
संसार: केवल सुख की चाह में है।
जीना: भोग में बीत रहा है।
शरीर: रोगों का घर बनता जा रहा है।
संबंध: अंततः वियोग में बदलते हैं।
संत समागम: आत्म-उपयोग और कल्याण का मार्ग है।
गुरुदेव ने कहा कि यदि मनुष्य इन सूत्रों को याद रखे तो वह जीवन की हर कठिन परिस्थिति से सुगमता से पार पा सकता है।













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