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जिस मंदिर क्षेत्र में चमत्कार होता है वह मंदिर अतिशय क्षेत्र होता है : आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्राचीन मंदिर के रहस्यों से पर्दा उठाया 


आचार्य श्री शांति सागर जी सहित पूर्वाचार्यों के आशीर्वाद से हमने पहली बार किसी मंदिर का जीणोद्धार कर नूतन जिनालय बनाने की प्रेरणा दी। यह मंगल देशना आचार्य श्री वर्धमानसागर जी ने पंच कल्याणक प्रतिष्ठा के मोक्ष कल्याणक अवसर पर धर्मसभा में प्रकट की। उन्होंने कहा कि अब पीपल्दा गांव नगर हो गया। पीपल्दा से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर…


पीपल्दा। पीपल्दा ग्राम अब श्री चंद्र प्रभु अतिशय मंदिर के नाम से भारत में विख्यात होगा। 972 वर्ष प्राचीन जिनालय में विगत 3 वर्षों पूर्व आए थे तब से अभी तक हमने भी अनेक अतिशय देखे और प्रभु की सकारात्मक उर्जा महसूस की। आचार्य श्री शांति सागर जी सहित पूर्वाचार्यों के आशीर्वाद से हमने पहली बार किसी मंदिर का जीणोद्धार कर नूतन जिनालय बनाने की प्रेरणा दी। यह मंगल देशना आचार्य श्री वर्धमानसागर जी ने पंच कल्याणक प्रतिष्ठा के मोक्ष कल्याणक अवसर पर धर्मसभा में प्रकट की। उन्होंने कहा कि अब पीपल्दा गांव नगर हो गया। प्राचीन जिनालय पहले रोड से 4 फीट नीचे था। वर्षा का पानी मंदिर में आता था। प्रभु के चमत्कार से बिना निकासी के जल निकल जाता था। श्री चंद्रप्रभु भगवान का पंचकल्याण प्रतिष्ठा महोत्सव हुआ। इस दौरान इंदौर जैसे महानगर से भक्त यहां आकर सौधर्म इंद्र बने। कोलकाता, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश सहित अनेक राज्यों के श्रावकों ने तन-मन-धन से भक्ति की।

आचार्यश्री ने कहा-अब यह अतिशय क्षेत्र है

जन्म कल्याणक पर हेलिकाप्टर से पुष्प वर्षा, तप कल्याणक पर प्रसिद्ध भामाशाह का हेलिकाप्टर से आना, मंदिर बहुमंजिला शिखर वाला बनना, संत भवन बनाना,उसके लिए भूमिदान, निर्माण सामग्री का दान ऐसे अनेक चमत्कार अतिशय प्राचीन श्री चंद्रप्रभु द्वारा ही हुए हैं। इसलिए श्री चंद्रप्रभु जिनालय को हम अतिशय क्षेत्र घोषित करते हैं। आपकी ही तरह श्री चन्द्रप्रभु भगवान भी संसारी प्राणी थे। जिन्होंने मनुष्य भव में युवराज बनकर राज संचालन किया। विवाह भी किया। आकाश में बिजली की चमक देखकर वैराग्य का निमित्त मिला।

रोज देवदर्शन और पूजन का संकल्प लें

आचार्य श्री ने कहा कि दीक्षा का प्रसंग आपने देखा। तप साधना से चार धातिया कर्मों को नष्ट कर केवल ज्ञान प्राप्त कर विहार कर धर्म देशना समवशरण में देते हैं। सम्मेद शिखर में नियोग धारण कर ध्यान से शेष 4 अधातिया कर्मों को नष्ट कर सिद्ध अवस्था प्राप्त करते हैं। सभी को चमत्कारी अतिशयकारी चंद्रप्रभु श्री का प्रतिदिन देव दर्शन, अभिषेक, पूजन का संकल्प लेना चाहिए। देव गुरु हमारे आराध्य हैं। मंगलवार को सुबह श्रीजी के अभिषेक पूजन के बाद आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व मुनिश्री हितेंद्र सागर जी ने बताया कि अरिहंत भगवान 4 कर्मों के बाद शेष 4 कर्म किस प्रकार श्रेणी बार क्षय कर सिद्धालय विराजित होते हैं। भगवान के मोक्ष जाने के बाद अग्निकुमार देव नख और केश के अग्नि संस्कार करते हैं।

दानदाताओं और सहयोगियों का किया सम्मान 

आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के संघ के सानिध्य में पंडाल से नूतन श्रीजी को प्रतिष्ठाचार्य मनोज शास्त्री के निर्देशन में रथ में विराजित कर नूतन मंदिर में नूतन वेदी पर मंत्रोच्चार पूर्वक पुण्यशाली परिवारों द्वारा विराजित किया गया। नूतन शिखर पर स्वर्ण कलशारोहण मनोज, संजीव गौरव सोगानी परिवार ने किया। ध्वजदंड आरती सनत निखिल विशाल जैन इंदौर पुण्यार्जक परिवार ने लगाए। मंदिर निर्माण समिति के प्रभारी लल्लूप्रसाद सिंघल, ओमप्रकाश, राजेंद्र, ओमप्रकाश बजाज ने बताया कि कार्यक्रम के दौरान नूतन जिनालय नूतन प्रतिमा वेदी, शासन रक्षक देवी-देवताओं, मंदिर और संत भवन निर्माण में तन, मन और धन से सहयोग करने वाले सभी दान दाताओं और सहयोगियों का तिलक, माला, दुप्पटा, स्मृति चिन्ह से सम्मान कर कृतज्ञता ज्ञापित की गई।

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