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महावीर और जैन धर्म का वैश्विक महत्व : वर्तमान को वर्द्धमान महावीर की आवश्यकता है


भगवान महावीर का नाम लेते ही जैन धर्म की स्मृति मन-मस्तिष्क में ताज़ा हो जाती है। वर्तमान समय में समस्त विश्व जैन धर्म के अस्तित्व को भगवान महावीर से जोड़कर देखता है, जबकि वास्तविकता यह है कि भगवान महावीर जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर हैं और उनसे पूर्व 23 तीर्थंकर हो चुके हैं। पढ़िए विजय कुमार जैन, मंत्री, भगवान महावीर जन्मभूमि कुण्डलपुर समिति का विशेष आलेख…


भगवान महावीर का नाम लेते ही जैन धर्म की स्मृति मन-मस्तिष्क में ताज़ा हो जाती है। वर्तमान समय में समस्त विश्व जैन धर्म के अस्तित्व को भगवान महावीर से जोड़कर देखता है, जबकि वास्तविकता यह है कि भगवान महावीर जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर हैं और उनसे पूर्व 23 तीर्थंकर हो चुके हैं।

आज के युग में भगवान महावीर के संदेशों की अत्यधिक आवश्यकता है। यदि समस्त विश्व “जियो और जीने दो” के सिद्धांत पर चले, तो विश्व में स्थायी शांति स्थापित हो सकती है। “अहिंसा परमो धर्मः” सुनने में भले ही पुराना लगे, लेकिन इसका अर्थ अत्यंत गहरा और तात्विक है।

हाल ही में भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने लंदन स्थित फेसबुक कार्यालय में अपने संदेश में “अहिंसा परमो धर्मः” लिखकर इसकी प्रासंगिकता को पुनः स्थापित किया। महात्मा गांधी ने भी इस सिद्धांत को अपने जीवन में अपनाकर देश को स्वतंत्रता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

भगवान महावीर के पंच कल्याणक

जैन मान्यता के अनुसार भगवान के जीवन को पाँच कल्याणकों में विभाजित किया गया है—

गर्भ, जन्म, तप, केवलज्ञान और मोक्ष कल्याणक।

गर्भ एवं जन्म कल्याणक

प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, भरत क्षेत्र के विदेह देश में स्थित कुण्डलपुर नगरी के राजा सिद्धार्थ और महारानी त्रिशला (प्रियकारिणी) के यहाँ भगवान महावीर का अवतरण हुआ।

आषाढ़ शुक्ल षष्ठी के दिन महारानी त्रिशला ने सोलह शुभ स्वप्न देखे, जो एक महान आत्मा के आगमन के संकेत थे। तत्पश्चात देवियाँ उनकी सेवा में उपस्थित हुईं और नौ माह तक उनकी सेवा करती रहीं।

चैत्र शुक्ल त्रयोदशी के दिन भगवान महावीर का जन्म हुआ। उस समय तीनों लोकों में आनंद छा गया। देवों द्वारा पुष्पवृष्टि हुई और सौधर्म इन्द्र ने सुमेरु पर्वत पर भगवान का 1008 कलशों से महाभिषेक किया तथा उनका नाम ‘वर्द्धमान’ रखा।

उनकी वीरता और निर्भीकता के कारण आगे चलकर उन्हें ‘महावीर’ नाम से संबोधित किया गया।

तप कल्याणक (दीक्षा और वैराग्य)

यौवन अवस्था में पहुँचने पर भगवान महावीर ने सांसारिक जीवन का त्याग कर वैराग्य का मार्ग अपनाया। उन्होंने विवाह प्रस्ताव को अस्वीकार कर ब्रह्मचर्य व्रत धारण किया।

मार्गशीर्ष वदी दशमी के दिन उन्होंने दिगंबर दीक्षा ग्रहण कर सभी वस्त्राभूषण त्याग दिए और तपस्या में लीन हो गए। कुछ समय पश्चात उन्होंने प्रथम आहार कूलग्राम में ग्रहण किया।

उपसर्ग और सहनशीलता

भगवान महावीर के जीवन में अनेक उपसर्ग आए, किंतु उन्होंने अद्भुत धैर्य और समता का परिचय दिया। उज्जयिनी के अतिमुक्त वन में रुद्र द्वारा किए गए उपसर्गों को उन्होंने शांत भाव से सहन किया।

सती चंदना की बेड़ियाँ उनके दर्शन मात्र से टूट गईं, जो उनकी आध्यात्मिक शक्ति का प्रमाण है।

केवलज्ञान कल्याणक

बारह वर्ष की कठोर तपस्या के पश्चात वैशाख शुक्ल दशमी को बिहार के जृंभिका ग्राम के समीप ऋजुकूला नदी तट पर भगवान महावीर को केवलज्ञान की प्राप्ति हुई।

इस अवसर पर देवों द्वारा समवसरण की रचना की गई, जहाँ भगवान ने समस्त जीवों के कल्याण हेतु दिव्यध्वनि प्रदान की।

भगवान महावीर के प्रमुख उपदेश

भगवान महावीर ने प्राणीमात्र के कल्याण हेतु अनेक सिद्धांत दिए, जिनमें प्रमुख हैं—

पाँच अणुव्रत — अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह

“जियो और जीने दो” का संदेश

“अहिंसा परमो धर्मः” का सिद्धांत

सभी जीवों के प्रति दया और करुणा

मोक्ष कल्याणक

भगवान महावीर ने कार्तिक कृष्ण अमावस्या के दिन बिहार के पावापुरी में मोक्ष प्राप्त किया। 72 वर्ष की आयु में उन्होंने समस्त कर्मों का क्षय कर सिद्ध पद प्राप्त किया।

उनके निर्वाण के उपलक्ष्य में दीप प्रज्ज्वलित किए गए, जो आगे चलकर दीपावली पर्व के रूप में प्रचलित हुआ।

महावीर जयंती का आयोजन

महावीर जयंती के अवसर पर जैन समाज द्वारा प्रभात फेरी, शोभायात्रा, अभिषेक, महाआरती, सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं सेवा कार्य आयोजित किए जाते हैं।

भक्तजन केशरिया वस्त्र धारण कर भगवान का अभिषेक करते हैं और विश्व शांति की कामना से महाशांतिधारा करते हैं। जगह-जगह जलसेवा, फल वितरण और प्रसाद वितरण किया जाता है।

कुण्डलपुर तीर्थ का विकास

विजय कुमार जैन के अनुसार, गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा से कुण्डलपुर तीर्थ का व्यापक विकास हुआ है। यहाँ नंद्यावर्त महल, महावीर मंदिर, ऋषभदेव मंदिर, त्रिकाल चौबीसी मंदिर एवं नवग्रह शांति जिनालय का निर्माण कराया गया है।

आधुनिक सुविधाओं से युक्त धर्मशालाओं का निर्माण कर तीर्थ को विकसित किया गया है, जिससे बिहार पर्यटन को भी बढ़ावा मिला है।

कुण्डलपुर महोत्सव का राजकीय आयोजन

वर्तमान में बिहार सरकार के पर्यटन विभाग द्वारा “कुण्डलपुर महोत्सव” राजकीय स्तर पर मनाया जाता है। मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार एवं मंत्री श्री श्रवण कुमार के सहयोग से यह आयोजन भव्य रूप ले चुका है।

इस अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों में देशभर के कलाकार भाग लेते हैं और अनेक गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति रहती है।

समापन संदेश

भगवान महावीर जयंती समस्त मानवता के लिए मंगलकारी हो। उनके सिद्धांतों के माध्यम से पूरे विश्व में अहिंसा, शांति और सद्भाव की स्थापना हो—यही इस पावन पर्व का संदेश है।

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