पहले ज्ञान प्राप्त करो, फिर दया का पालन करो।’ यह पावन संदेश भिलुड़ा स्थित शिवगौरी आश्रम से धर्माचार्य कनक नंदी जी ने अंतरराष्ट्रीय वेबिनार के माध्यम से विश्वभर के श्रद्धालुओं को दिया। बांसवाड़ा/भिलुड़ा से पढ़िए, अजीत कोठिया की यह रिपोर्ट…
बांसवाड़ा/भिलुड़ा (राजस्थान) | ‘पहले ज्ञान प्राप्त करो, फिर दया का पालन करो।’ यह पावन संदेश भिलुड़ा स्थित शिवगौरी आश्रम से धर्माचार्य कनक नंदी जी ने अंतरराष्ट्रीय वेबिनार के माध्यम से विश्वभर के श्रद्धालुओं को दिया। गुरुदेव ने स्पष्ट किया कि जब तक जीव स्वयं को देह (शरीर) मानता है, तब तक वह ‘बहिरात्मा’ है। स्वयं को काला, गोरा, सुंदर या कुरूप मानना और शरीर में ही बुद्धि लगाना मिथ्यात्व है। उन्होंने कहा कि संसार का मूल कारण ही यह गलत धारणा है कि ‘मैं शरीर हूँ’। जो व्यक्ति शरीर को ही सब कुछ मानता है, वही अन्याय, अत्याचार, भ्रष्टाचार और दुर्व्यवहार जैसे पापों में लिप्त होता है।
सम्यक दर्शन के बिना तपस्या अधूरी
गुरुदेव ने बताया कि आत्मा के अनंत गुणों में स्वयं को जानना सबसे महान गुण है। आत्म-श्रद्धा के साथ की गई दया और करुणा का पुण्य अनंत गुना बढ़ जाता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सम्यक दर्शन के बिना वर्षों की तपस्या भी व्यक्ति को परमात्मा नहीं बना सकती। परमात्मा बनने के लिए अंतरात्मा का जागृत होना अनिवार्य है।
‘मैं ही परमात्मा हूँ’ – यह विश्वास ही उत्थान है
वेबिनार के दौरान गुरुदेव ने आत्मविश्वास पर बल देते हुए कहा, “मेरा उत्थान मैं स्वयं ही कर सकता हूँ।” द्रव्य की अपेक्षा सभी जीव एक समान हैं। ‘मैं ही परमात्मा हूँ’—यह दृढ़ विश्वास ही अंतरात्मा की पहचान है। सम्यक दृष्टि होने पर अंतःकरण में यह विश्वास स्वतः ही जाग्रत हो जाता है।
सांस्कृतिक प्रस्तुति
कार्यक्रम का मंगलाचरण मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी महाराज ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता “आओ धीरे-धीरे चेतन एकत्व भाव में” के माध्यम से किया। इस अंतरराष्ट्रीय आयोजन की विस्तृत जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत (सागवाड़ा) ने दी।













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