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समाज में रिश्तों की ठंडी पड़ती आंच : महानगरों की चाह, बढ़ती अपेक्षाएँ और जैन समाज में विलंबित विवाह 


समाज की मजबूती केवल उसकी आर्थिक प्रगति से नहीं मापी जाती, बल्कि उस समाज में बसे परिवारों की आत्मीयता और रिश्तों की मधुरता से मापी जाती है। जब रिश्तों की यह मधुरता कम होने लगती है, तब समाज के सामने कई नई समस्याएँ खड़ी हो जाती हैं। आज पढ़िए, जयेंद्र जैन ‘निप्पू’ चंदेरी का यह आलेख…


चंदेरी। समाज की मजबूती केवल उसकी आर्थिक प्रगति से नहीं मापी जाती, बल्कि उस समाज में बसे परिवारों की आत्मीयता और रिश्तों की मधुरता से मापी जाती है। जब रिश्तों की यह मधुरता कम होने लगती है, तब समाज के सामने कई नई समस्याएँ खड़ी हो जाती हैं। आज जैन समाज में युवाओं के विवाह में बढ़ती देरी एक ऐसा ही विषय है, जिस पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक हो गया है। पहले के समय में विवाह जीवन का स्वाभाविक और समय पर होने वाला संस्कार माना जाता था। परिवारों में आपसी संपर्क अधिक था, अपेक्षाएँ सीमित थीं और जीवन में सादगी का स्थान प्रमुख था। युवक-युवती के गुण, संस्कार और परिवार की मर्यादा को देखकर रिश्ते तय होते थे। उस समय जीवन की गति भले ही धीमी थी, पर रिश्तों की गर्माहट कहीं अधिक थी। परंतु आज परिस्थितियाँ तेजी से बदल रही हैं। आधुनिक शिक्षा, करियर की दौड़ और महानगरों की चमक-दमक ने युवाओं की सोच को एक नई दिशा दी है। यह परिवर्तन स्वाभाविक भी है, क्योंकि हर पीढ़ी अपने समय के अनुसार जीवन को ढालती है। लेकिन जब यह परिवर्तन जीवन के मूल सामाजिक संतुलन को प्रभावित करने लगे, तब उस पर विचार करना आवश्यक हो जाता है।

आज समाज में एक नई प्रवृत्ति भी दिखाई देती है

आज के समय में युवा पीढ़ी शिक्षा और करियर को अत्यधिक महत्व देती है। उच्च शिक्षा प्राप्त करना, बड़े शहरों में रोजगार ढूँढना और अपने जीवन को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना उनका प्राथमिक लक्ष्य बन गया है। परिणाम स्वरूप विवाह को कई बार जीवन की प्राथमिकताओं की सूची में पीछे कर दिया जाता है। जब तक करियर स्थिर होता है, तब तक युवाओं की आयु तीस वर्ष या उससे अधिक हो जाती है। परंतु विवाह में देरी का कारण केवल शिक्षा और करियर ही नहीं है। आज समाज में एक नई प्रवृत्ति भी दिखाई देती है-महानगरों में बसने की तीव्र इच्छा। बड़े शहरों की सुविधाएँ, आधुनिक जीवनशैली और आर्थिक अवसर युवाओं को आकर्षित करते हैं। इस कारण छोटे शहरों और कस्बों के रिश्तों को कई बार उतना महत्व नहीं दिया जाता।

 स्वभाव, संस्कार और पारिवारिक मूल्य पीछे रह जाते है

जैन समाज की एक बड़ी विशेषता यह रही है कि उसके अनेक परिवार छोटे नगरों और ऐतिहासिक कस्बों में बसे हुए हैं। इन स्थानों में परंपरा, संस्कृति और सामुदायिक जीवन की गहरी जड़ें हैं। किंतु जब विवाह के निर्णय में केवल शहर की चमक-दमक को प्राथमिकता दी जाने लगती है, तब कई अच्छे रिश्ते केवल इस कारण से पीछे छूट जाते हैं कि वे किसी छोटे नगर से जुड़े होते हैं। विवाह में देरी का एक और महत्वपूर्ण कारण आजकल रूप-रंग की अत्यधिक अपेक्षा भी बन गया है। आधुनिक समाज में बाहरी सुंदरता को कई बार इतना महत्व दिया जाने लगा है कि स्वभाव, संस्कार और पारिवारिक मूल्यों जैसे महत्वपूर्ण गुण पीछे रह जाते हैं। युवक-युवती दोनों ही अपने जीवनसाथी में एक आदर्श रूप की कल्पना करते हैं, और जब वास्तविकता उस कल्पना से थोड़ी अलग होती है तो रिश्ता अस्वीकार कर दिया जाता है।

स्वाभाविक रूप से रिश्तों का दायरा संकुचित हो जाता 

सुंदरता की चाह स्वाभाविक है, परंतु जब यह चाह एक कठोर शर्त बन जाती है, तब रिश्तों की संख्या स्वाभाविक रूप से कम होने लगती है। जीवन की लंबी यात्रा केवल सुंदर चेहरे से नहीं, बल्कि समझ, सहयोग और आपसी सम्मान से सुखद बनती है। आजकल एक और प्रवृत्ति देखने में आती है-अकेले पुत्र या पुत्री की चाहत। कई परिवार चाहते हैं कि उनका रिश्ता ऐसे घर में हो जहाँ केवल एक ही संतान हो। इसके पीछे संपत्ति, जिम्मेदारी और भविष्य की सुविधाओं से जुड़ी सोच काम करती है। परंतु जब हर परिवार यही अपेक्षा रखने लगता है, तब स्वाभाविक रूप से रिश्तों का दायरा संकुचित हो जाता है। इन सभी कारणों का संयुक्त प्रभाव यह होता है कि विवाह योग्य युवाओं की संख्या तो बढ़ती जाती है, परंतु उपयुक्त रिश्तों की संख्या सीमित होती जाती है। धीरे-धीरे यह स्थिति समाज के लिए चिंता का विषय बन जाती है।

समाज स्तर पर संवाद और परिचय के अवसर बढ़ाएं

यहाँ यह समझना आवश्यक है कि विवाह केवल सामाजिक परंपरा नहीं, बल्कि जीवन का एक संतुलित और आवश्यक पक्ष भी है। यह वह बंधन है जो मनुष्य को मानसिक सहारा, पारिवारिक स्थिरता और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करता है। इसलिए विवाह को केवल औपचारिकता या सामाजिक प्रतिष्ठा का विषय नहीं, बल्कि जीवन के संतुलन के रूप में देखना चाहिए। समाधान की दिशा में सबसे पहले हमें अपनी अपेक्षाओं को थोड़ा सरल और व्यावहारिक बनाना होगा। यदि हम केवल आदर्श परिस्थितियों की प्रतीक्षा करते रहेंगे, तो अनेक अच्छे अवसर हमारे सामने से निकल जाएंगे। दूसरा महत्वपूर्ण कदम यह है कि समाज स्तर पर संवाद और परिचय के अवसर बढ़ाए जाएँ। सामूहिक परिचय सम्मेलन, सामाजिक कार्यक्रम और युवा संवाद के माध्यम से युवक-युवतियों को एक-दूसरे को समझने का अवसर मिल सकता है।

जब युवा छोटे शहरों की सादगी को भी स्वीकार करेंगे

तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण उपाय यह है कि विवाह के निर्णय में बाहरी आकर्षण की अपेक्षा स्वभाव, संस्कार और जीवन मूल्यों को अधिक महत्व दिया जाए। जीवन की वास्तविक खुशियाँ इन्हीं गुणों से बनती हैं। अंततः समाज को यह याद रखना होगा कि आधुनिकता को अपनाना आवश्यक है, परंतु अपनी सांस्कृतिक और सामाजिक जड़ों को भूल जाना उचित नहीं है। यदि हम शिक्षा, करियर और आधुनिक जीवनशैली के साथ-साथ रिश्तों की सादगी और आत्मीयता को भी बनाए रखें, तो यह समस्या धीरे-धीरे कम हो सकती है। जब समाज अपनी अपेक्षाओं की दीवारों को थोड़ा कम करेगा, जब युवा महानगरों की चमक के साथ छोटे शहरों की सादगी को भी स्वीकार करेंगे और जब विवाह के निर्णय में बाहरी सुंदरता से अधिक मन की सुंदरता को महत्व मिलेगा, तब रिश्तों की वह ठंडी पड़ती आंच फिर से प्रज्वलित हो उठेगी और तब समाज यह अनुभव करेगा कि सच्ची प्रगति केवल ऊँची इमारतों और बड़े पदों में नहीं, बल्कि उन घरों में बसती है जहाँ रिश्तों की गर्माहट, समझ और विश्वास की रोशनी सदैव जलती रहती है।

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