समाचार

भोजशाला में दिखाई देता है हिन्दू और जैनों का सह अस्तित्व : आचार्य श्री सुनील सागर जी ने कहा-सद्भाव से संरक्षित करे अपनी सांस्कृतिक विरासत


शनिवार प्रात: रिमझिम बारिश के साए हुआ आचार्य श्री आदिसागर जी की अकलिंकर के परम्परा के चतुर्थ पट्टाचार्य श्री सुनील सागर जी का भव्य मंगल प्रवेश धारा नगरी में प्रसिद्ध दिगंबर जैन तीर्थ मानतुंगगिरि के रास्ते हुआ। इंदौर से पढ़िए, श्रीफल साथी ओम पाटोदी की यह रिपोर्ट…


इंदौर। शनिवार प्रात: रिमझिम बारिश के साए हुआ आचार्य श्री आदिसागर जी की अकलिंकर के परम्परा के चतुर्थ पट्टाचार्य श्री सुनील सागर जी का भव्य मंगल प्रवेश धारा नगरी में प्रसिद्ध दिगंबर जैन तीर्थ मानतुंगगिरि के रास्ते हुआ। जहां आचार्य संघ द्वारा प्राचीन जिनबिम्बों के साथ निकट ही बिजूर ग्राम के भूगर्भ से प्राप्त अतिशयकारी भगवान आदिनाथ स्वामी के दर्शन किए। प्राचीन जिन प्रतिमा सहित मूल नायक भगवान की विश्व मंगल शांति धारा आचार्य श्री के मुखारविंद से रिद्धि मंत्रों के साथ की गई। जिसका सौभाग्य धार के श्रेणिक कुमार गंगवाल परिवार एवं इंदौर के सतीशकुमार रायकवार परिवार ने प्राप्त किया।

भोज शाला का अवलोकन किया

तीर्थ संरक्षिणी महासभा के पुरातत्व संयोजक, वर्द्धमानपुर शोध संस्थान के ओम पाटोदी ने बताया कि आचार्य संघ इसके बाद भव्य चल समारोह के साथ ऐतिहासिक धरोहर भोजशाला पहुंचे। जहां पर भोज ‌शाला संघर्ष समिति के गोपाल शर्मा, वैश्य समाज, जैन समाज एवं अन्य गणमान्य नागरिकों ने आचार्य संघ को नमोस्तु निवेदित करके आशीर्वाद प्राप्त किया। शर्मा ने भोजशाला में शेष बचे धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के अवशेषों को आचार्य श्री को अवलोकन करवाया। जिसे आचार्य श्री ने बारीकी से देखा।

भोज शाला में हुई थी भक्तामर स्तोत्र की रचना

आचार्य श्री ने भोजशाला में ही जनसमूह के बीच मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि राजा भोज विद्वान और धर्म संस्कृति में रुचि रखने वाले थे। यहां गणेश स्वस्तिक आदि अवशेष हमारे सांस्कृतिक महत्व को प्रदर्शित करते हैं। यहां से लंदन ले जायी गई जिन सरस्वती वाग्देवी की प्रतिमा मूलरूप से जैन धर्म से संबंधित है। यह स्थान प्राचीन काल में निश्चित रूप से विद्या अध्ययन केंद्र, विद्यालय, महाविद्यालय के रूप भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार एवं प्राकृत, संस्कृत आदि भाषाओं के संरक्षण संवर्धन के लिए महत्वपूर्ण संस्थान के रूप में विख्यात रहे होंगे।

जैनाचार्य श्री मानतुंग जी को यहां रखा गया था

कहते हैं बहुत बड़े संत जैनाचार्य श्री मानतुंग स्वामी जी को भी यहां रखा गया था। जहां उन्होंने भक्तामर स्तोत्र की रचना की। सभी लोगों को इसे भारत की संस्कृति, पुरातत्व, ब्राम्ही, प्राकृत, संस्कृत आदि भाषाओं के अध्ययन, उनके संरक्षण संवर्धन के लिए इसका उपयोग किया जाए एवं सभी समाज सद्भाव के साथ इसका विकास करें।

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
0
+1
0
+1
0
Shree Phal News

About the author

Shree Phal News

Add Comment

Click here to post a comment

You cannot copy content of this page