संत शिरोमणि आचार्य़श्री विद्यासागर जी महाराज के शिष्य निर्यापक मुनिपुंगवश्री सुधासागर जी महाराज के सानिध्य में हरीपर्वत स्थित श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर के अमृत सुधा सभागार में चल रहे श्री समयसार प्रशिक्षण शिविर का समापन 9 नवंबर को हुआ। इस अवसर पर मुनि श्री के प्रवचन हुए। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट….
आगरा। संत शिरोमणि आचार्य़श्री विद्यासागर जी महाराज के शिष्य निर्यापक मुनिपुंगवश्री सुधासागर जी महाराज के सानिध्य में हरीपर्वत स्थित श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर के अमृत सुधा सभागार में चल रहे श्री समयसार प्रशिक्षण शिविर का समापन 9 नवंबर को हुआ। शिविर के अंतिम दिन का शुभारंभ बालिकाओं के मंगलाचरण की प्रस्तुति के साथ किया। इसके बाद शिविरार्थियों ने विशेष अर्घ्यों से गुरु पूजन किया। इस दौरान सभी को गुरु भक्ति करने का अवसर मिला। शिविर के समापन पर सभी शिविरार्थियों ने हमेशा के लिए धर्म प्रभावना में अग्रसर होने का संकल्प लिया। भोजन व्यवस्था के लिए चातुर्मास समिति की प्रशंसा करते हुए उनका स्वागत सम्मान किया गया।
किया गया सम्मानित
इस दौरान मुनिपुंगवश्री सुधासागर जी महाराज ने हजारों शिविरार्थियों को श्रमण संस्कृति संस्थान की नीति और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। शिविर में अच्छा प्रदर्शन करने वाले बालक -बालिकाओं को ट्रॉफी देकर सम्मानित किया गया। गुरु देव के सानिध्य में सम्मान पाकर यह पल किसी गौरव से कम नहीं था।
जिंदगी को जीना सीखो
शिविर के अंतिम दिन मुनिश्री ने भक्तों से कहा कि हमें सृष्टि और जीवन को बहुत गहराई से समझना है क्योंकि हमारी जिंदगी निकल रही है और हमें जिंदगी जीना है। जिंदगी जीने का आनंद हर क्षण ऐसा हो जो हमें लगे कि मैं धन्य हो रहा हूं। हर कार्य ऐसा हो कि हमें लगे कि मैं गौरवान्वित हो रहा हूं, एक आनंद की अनुभूति हो। ऐसी जिदंगी प्रकृति नही देने वाली, प्रकृति रॉ मटेरियल देती है। उससे क्या बनाना है वह निर्णय आपका है और बनाने का नाम ही विज्ञान है। हर वस्तु प्रकृति में है, विज्ञान किसी वस्तु का निर्माता नहीं है, वस्तु अविनाशी होती है। उस वस्तु का विशेष गुण जो प्रकट किया जाता है, वह प्रकृति के हाथ में नहीं है, हमारे तुम्हारे हाथ में है, कितनी वस्तुएं हैं जो संसार में भरी पड़ी हैं वनस्पति के रूप में लेकिन वैद्य उसे हाथ में जाते ही औषधि बना देता है। पृथ्वी में पड़े हुए हैं सारे रत्न, पृथ्वी तो कहती है ये सब हमारे लिए पृथ्वीकाय हैं, कोई अंतर नहीं है एक सेंडस्टोन और रत्नों के पत्थर में।
बड़ों का सम्मान करो
उन्होंने कहा कि जिंदगी में कभी भी हो बड़ों को सम्मान दे सको तो बहुत अच्छी बात है नहीं दे सको तो जिंदगी में एक कार्य जरूर करना, कार्य तुम करना और सम्मान तुम्हारे गार्जियन का हो। कहीं ऐसा ना हो कि तुम्हारे कार्य से उन्होंने जो इज्जत कमाई है वो धूल में मिल जाए। बेटा जब भी गलती करता है, दुनिया उसके बाप पर जाती है, शिष्य कभी कोई गलती करता है, सीधा गुरु पर लांछन जाता है, रास्ते में कोई लूटता है सीधा वह रास्ता बदनाम होता है। धर्मी गलती करता है बदनाम धर्म होता है। जैनी गलती करता है बदनामी जैनधर्म, जैनजाति की होती है। अपनी जिंदगी में देखो तुम्हारे ऊपर किन-किन के उपकार हैं- जन्मदाता का, कुल का, जाति का, उसके बाद संस्थान का धर्म का, पढ़ने वालों का, हम साधुओं का इन सब की लिस्ट बना लो और प्रतिज्ञा कर लो इन सबको सम्मान दिला पाऊं या ना दिला पाऊं, मेरे कारण से कभी इनका अपमान नहीं होने दूंगा। तुम्हारे 24 घंटे की हर हरकत में कोई भी हरकत बदनामी कर सकती है तुम्हारे कपड़ों से भी बदनामी हो सकती है, तुम यह मत समझना कि बदनामी का अर्थ है व्यसन करना, दुर्गुणी होना। तुम्हारी पहनने की पोशाक भी इन सबको बदनाम कर सकती है। पोशाक ही नहीं, पोशाक के साथ-साथ आपका खान-पान आपकी थाली इन सबको बदनाम कर सकती है। विचार ऐसे बनाओ जिससे स्वयं को भी गर्व हो और तुम्हारे विचार जो सुने उसको भी गर्व हो जाए कि तुम्हारे इतने अच्छे विचार। संस्थान को भी, मां-बाप को भी, हमें भी गर्व हो कि मेरे बच्चों के ये विचार हैं।
गुरु का ऋण नहीं चुका सकते
मुनि श्री ने कहा कि तुम्हें कितने ही क्रोध आ जाए, शास्त्री का क्रोध अलग होना चाहिए। थोड़ा गाली पुराण पढ़ो, शास्त्री के मुख से निकली हुई गाली में थोड़ी सभ्यता होगी। अधिक से अधिक अज्ञानी कहीं का मूढ़। जैन दर्शन में किसी भी क्रिया में न पाप है न पुण्य है, सवाल यह है कि कौन कर रहा है। वह कर रहा है जो जगत में उच्चासन पा चुका है। मोबाइल पर भी तुम्हारे संस्थान की पहचान हो। फोन भी संस्थान की ध्वजा लेकर चले। गुरु का ऋण चुकाया नहीं जाता है, कुछ ऐसा करो कि गुरु ऋण माफ कर देता है। वह घर में कैलेंडर नहीं टंगा है, तुम्हारे चरित्र का प्रमाण पत्र टंगा है। वह कार्य करो जिंदगी में, जिससे स्वयं को भी गर्व हो, स्वयं भी मस्तक उठाने का भाव करें,स्वयं की नजरों में उठना सीखो। दुनिया की नजरों से गिरो या ना गिरो सबसे ज्यादा निकृष्ट व्यक्ति वह है स्वयं की नजरों में गिर गया। आप कभी अपनी खुद की नजरों में मत गिरना। कहीं ऐसा ना हो तुम्हारे खुद के कृत्य से तुम बाजार में निकलने मे शर्म कर रहे हो, मन्दिर जाने में शर्म लग रही हो।













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