जयपुर के अजित जैन जगद्गुरु स्वामी चारुकीर्ति भट्टारक जी के असमय समाधि में लीन होने उद्वेलित हैं। उन्होंने लिखा है कि आज मन में यही सवाल है। शब्द पंगु लग रहे हैं। व्यक्ति का व्यकितत्व जब शब्दों की सीमा से परे हो जाये तो खामोशी बोलती है। और चारु कीर्ति स्वामी जी तो खामोशी से बोलने में सिद्ध थे। कल बेलगोला भी मानो खामोश सा था। पढ़िए उनकी यह कविता…
एक सूनापन
दिल दिमाग में है – सभी के।
चारु कीर्ति भट्टारक महास्वामी जी ने अपने विचार और आचरण से न सिर्फ परम्परा का गौरव बढ़ाया अपितु समाज को जुड़कर रहना सिखाया।
जैन धर्म की कीर्ति को
चारो ओर फैलाने वाले
युग नायक
कर्म नायक
धर्म नायक
मुनि भक्त नायक
लोक नायक
अनुशासन नायक
वात्सल्य नायक
भाषा नायक
वैचारिक नायक
योजना नायक
साधना साधक
को सदैव समर्पित
शीश…
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