जैन समाज के पर्वाधिराज पर्युषण को लेकर समाजजनों में धार्मिक उल्लास तो है ही, साथ ही इस उत्साह के साथ इसका इंतजार किया जा रहा है कि अब यह वह समय है जब हम स्व को जान सकें। अंतरआत्मा को जगाकर संयम मार्ग की ओर कदम बढ़ाएं। यह विदित है कि पयुर्षण पर्व श्वेतांबर जैन समाज 20 अगस्त से मनाना आरंभ करेंगे तो दिगंबर जैन समाज के पर्युषण 28 अगस्त से शुरू होंगे। श्रीफल जैन न्यूज के साथ हम यह जानने की कोशिश करते हैं कि पर्युषण आखिर है क्या? क्यों मनाया जाता है? और इसका महत्व क्या है? उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित प्रस्तुति आज पढ़िए…
इंदौर। भारतीय संस्कृति में पर्वों का बहुत महत्व है। पर्व का नाम सुनते ही परिग्रह, राग, द्वेष, खानपान की ही कल्पना करते हैं अथवा खुश होते हैं, लेकिन दशलक्षण धर्म पर्युषण पर्व आने और बल्कि आने से भी पहले श्रावकों के मन में अति उत्साह रहता है। सबसे बड़ी बात यह उत्साह खाना-पीना छोड़ने के प्रति रहता है और इस दौरान एक कंपीटिशन सा रहता है कि किसका त्याग अधिक है। इन दिनों छोटे से छोटे बच्चे तक व्रत,उपवास, संयम तथा स्वाध्याय करते हैं। सभी प्रातः देवदर्शन, पूजन, व्रत, उपवास, एकासन्न आदि करते हैं। दिल्ली की नीति जैन कहती हैं कि कितने श्रावक दस दिनों तक निर्जल उपवास भी करते हैं तथा अपने कर्मों की निर्जरा करते हैं। दशलक्षण पर्युषण महापर्व पर धर्मात्मा बंधु आत्मा के दस धर्मों की विशेष आराधना करते हैं। उत्तम, क्षमा, मार्दव, आर्जव, सत्य, शौच, संयम, तप, त्याग, आकिंचन और ब्रह्मचर्य आत्मा के स्वाभाविक धर्म है, लेकिन अशुम कर्मों के उदय से इन धर्मों की आराधना भले ही जैन श्रावक ही करते हैं, जो आत्मा के अस्तित्व को स्वीकारते हैं। दस दिनों तक इन दस धर्मों की भावपूर्वक आराधना करने वाला शीध्र ही आत्मा की अनुमति को प्राप्त करता है और मोक्ष की ओर अग्रसर हो सकते हैं। ये दस धर्म आत्मा को शुद्ध बनाते हैं।
इसलिए महत्व है 10 लक्षण पर्व यानि पर्युषण का
जैन धर्म मंे 10 लक्षण पर्वका बहुत महत्व है। इस पर्व मैं जिनालयों में धर्म की प्रभावना की जाती है। यह पर्व आध्यात्मिक पर्व है। इस पर्व में उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन, ब्रह्मचर्य आदि जीवन मूल्य की आराधना होती है। यह पर्व तीर्थंकरों की पूजा का नहीं या अन्य आराध्य की पूजा का नहीं, बल्कि गुणों की आराधना उपासना का पर्व है। इस पर्व में व्यक्ति शक्ति और सामर्थ्य अनुसार व्रत औैर उपवास करते हैं। यह पर्व जीवन में सुख एवं शांति के लिए मनाया जाता है। इस समय अधिक से अधिक समय धर्म में लगाया जाता है।
यह है जैन धर्म में 10 लक्षण धर्म
उत्तम क्षमा, क्रोध छोड़कर सबको क्षमा कर सकूं तथा सबसे क्षमा मांग सकूं, उत्तम मार्दव, मान नहीं करना घमंड छोड़ना, उत्तम आर्जव, कपट नहीं करना सरलता लाना, उत्तम शौच, लोभ का त्याग करना, उत्तम सत्य, सत्य वचन ही बोलना, उत्तम संयम, इंद्रिय व मन को बश मे करना, उत्तम तप, इच्छाओं को रोकना तथा तप धारण करना, उत्तम त्याग, चार प्रकार का दान आदि देना, उत्तम आकिंचन, ममत्त्व का त्याग करना उत्तम ब्रह्मचर्य, विषय सेवन को छोड़ कर अपनी आत्मा मंे लीन होना। इन दिनों में तत्वार्थ सूत्र के अध्याय का व्याख्यान किया जाता है। तिथि दसवीं के दिन सुगंध दशमी या धूप दशमी के रूप में मनाया जाता है तथा अंतिम दिन अनंत चतुर्दशी के रूप मे मनाया जाता है।
‘पर्वों का राजा’ आत्म-चिंतन, पश्चाताप और क्षमा का पर्व
पर्युषण पर्व जैन धर्म का एक प्रमुख पर्व है, जिसे ‘पर्वों का राजा’ भी कहा जाता है। यह पर्व आत्म-चिंतन, पश्चाताप और क्षमा का समय होता है। यह भाद्रपद मास में मनाया जाता है और जैन धर्मावलंबी इसे बड़े उत्साह और भक्ति के साथ मनाते हैं। श्वेतांबर जैन इसे 8 दिनों तक मनाते हैं, जिसे अष्टान्हिका कहा जाता है और दिगंबर जैन 10 दिनों तक मनाते हैं, जिसे दसलक्षण पर्व कहते हैं। पर्युषण पर्व जैनियों को अपने कर्मों का आत्मनिरीक्षण करने और पिछले किए गए गलतियों के लिए पश्चाताप करने का अवसर प्रदान करता है। इस पर्व में, लोग एक दूसरे से क्षमा मांगते हैं और दूसरों को क्षमा करते हैं। यह ‘क्षमापना’ के रूप में मनाया जाता है, जहां लोग एक दूसरे को ‘खामेमि सव्वे जीवा, सव्वे जीवा खमंतु मे’ (मैं सभी जीवों को क्षमा करता हूं, सभी जीव मुझे क्षमा करें) कहकर क्षमा करते हैं। पर्युषण पर्व अहिंसा (अहिंसा परमो धर्मः) और प्रेम के सिद्धांतों पर जोर देता है। जैन धर्म में अहिंसा का अर्थ है किसी भी जीव को किसी भी प्रकार की हानि न पहुंचाना। यह पर्व जैनियों को अपनी आध्यात्मिक और मानसिक उन्नति पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रेरित करता है। वे उपवास, ध्यान, और धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करते हैं। पर्युषण पर्व को मोक्ष प्राप्ति (मुक्ति) के मार्ग में एक महत्वपूर्ण कदम है।
पर्युषण पर्व कैसे मनाया जाता है?
जैन धर्मावलंबी पर्युषण पर्व के दौरान उपवास करते हैं और अपनी भौतिक आवश्यकताओं को कम करते हैं। वे धार्मिक ग्रंथों का पाठ करते हैं, मंदिरों में जाते हैं, और धार्मिक प्रवचन सुनते हैं। वे एक दूसरे से क्षमा मांगते हैं और दूसरों को क्षमा करते हैं। वे गरीबों और जरूरतमंदों को दान देते हैं। वे अहिंसक जीवनशैली जीने का संकल्प लेते हैं और दूसरों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करते हैं। इन दिनों में तत्वार्थ सूत्र के अध्याय का व्याख्यान किया जाता है। तिथि दसवीं के दिन सुगंध दशमी य धूप दशमी के रूप में मनाया जाता है तथा अंतिम दिन अनंत चतुर्दशी के रूप में मनाया जाता है।













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