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साइंस ऑफ लिविंग सत्र जारी : जो खुद को समझ पाते हैं वे ही खुदा बन पाते हैं- मुनि श्री निरंजनसागर जी महाराज


कुंडलपुर में मुनि श्री निरंजन सागर महाराज ने प्रवचन के दौरान कहा कि हम स्व की ओर ध्यान न देकर पर की ओर ध्यान देते हैं, तो यह हमारी अज्ञानता है। पढ़िए जयकुमार जैन जलज/राजेश रागी की विशेष रिपोर्ट…


कुंडलपुर। सुप्रसिद्ध सिद्धक्षेत्र कुंडलपुर में मुनि श्री निरंजन सागर महाराज ने कहा कि सब का पता हमें पता है पर खुद का पता पता नहीं। साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में हम खुद को खोजने जा रहे हैं। यह प्रयास जिन्होंने पूर्ण कर लिया, उन्होंने अनंत आनंद की प्राप्ति कर ली है। हम स्व और पर के भेद विज्ञान को समझने का प्रयास करें। स्व अर्थात आत्म तत्व और पर अर्थात इस आत्म तत्वों से भिन्न जो भी दृश्यमान अदृश्य मान सत्व है सभी। हम स्व की ओर ध्यान न देकर पर की ओर ध्यान देते हैं, तो यह हमारी अज्ञानता है। आचार्य कहते हैं कि उत्तमा स्व आत्म चिंता अर्थात अपनी आत्मा की चिंता करना उत्तम है,श्रेष्ठ है।

इसे सही स्वार्थी कहा है (स्व+ अर्थी) जो अपने आत्म तत्व को ग्रहण करता है, उसे स्वार्थी कहते हैं। लौकिक जगत में स्वार्थी तो सभी हैं परंतु आध्यात्मिक जगत में स्वार्थी बनना सही मायने में स्वार्थी है। हम देहाती है (देह+ अति) जो देह पर अतिरिक्त ध्यान दे, वह देहाती ही तो है। यह बहुमूल्य नर पर्याप्त नारायण बनने का खुद से खुदा बनने का आत्मा से परमात्मा बनने का मार्ग प्रशस्त करने वाला पर्याय है। जो व्यक्ति स्वयं चार कदम नहीं चल सकता, वह दूसरों को क्या सहारा देगा।

इसी प्रकार जो अपना आत्म कल्याण नहीं कर सकतास वह दूसरों का या जगत का कल्याण क्या करेगा। इसलिए सर्वप्रथम अपने आत्मतत्व की चिंता अर्थात उसका ध्यान, मनन ,श्रद्धान चिंतवन करो, जिसके माध्यम से इस निरंजन निराकार ज्योति स्वरूप की प्राप्ति की जा सके। हमारा पता हमें पता नहीं और जगत का पता हम पता करने में लगे हैं। ऐसा व्यक्ति लापता( मूर्ख)ही कहलाता है। जिसे स्वयं का पता भी पता नहीं। हम आज तक देहाती बनते आए हैं पर देहातीत (देह + अतीत) नहीं बन पाए हैं। उस सिद्ध अवस्था को प्राप्त नहीं कर पाए हैं। आज भगवान बनने की होड़ सी मची रही है। सभी ऐश्वर्य वाली प्रभुता से युक्त बनना चाहते हैं।

अपनी ढपली अपना राग। स्वयं तो निराधार और जगत को दिखा रहे आधार।ऐसे लोगों का नारा है भक्त नहीं भगवान बनेंगे। आप भगवान बनें और सभी भगवान बनें यह श्रेष्ठ विचार है, परंतु बिना भक्त बने भगवत सत्ता को प्राप्त करना त्रिकाल असंभव है। हमने आज तक ऐसी भक्ति नहीं की जिसके माध्यम से भगवान बनने का मार्ग खुल जाए। बिना मार्ग पर चले मंजिल नहीं मिलती। मोक्ष के मंदिर तलक हरगिज़ कदम जाता नहीं। जो बिना भक्त बने भगवान की परिकल्पना मन में रखे हुए हैं, यह एक विकृत मानसिकता का नकारात्मक परिणाम है। खुदा बनने के पहले खुद को समझना होगा। इस संसार में स्वयं को समझने के तीन ही ऐसे समीचीन माध्यम हैं, जिनका अवलंबन लेकर खुद को समझा जा सकता है।

जिसके जीवन में सच्चे देव हैं, जिसके जीवन में सच्चे गुरु हैं और जिसके जीवन में सच्चे शास्त्र हैं, वही व्यक्ति इन तीन रत्नों के माध्यम से अपने स्वरूप तक पहुंच सकता है। यह शरीर शव बने इसके पहले शिव (मोक्ष) को जाने का मार्ग जानना उस पर चलना होगा। अर्थी से पहले अर्थ को समझें, उस अर्थ को सार्थक करें वरना अनर्थ निश्चित है। जो सिद्धि प्रसिद्धि से कोसों दूर है, उसने ही अपने आत्म तत्व को सिद्ध किया है। जिसने खुद को समझने का प्रयास किया है, पूरी दुनिया ने भी उसी को समझने का प्रयास किया है। पूरी दुनिया में ऐसे विरले ही लोग हैं, जो खुद को समझ पाते हैं, वही खुदा बन पाते हैं।

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