राजस्थान के जैैन संतों की समृ़द्ध श्रंखला के तहत कई संतों का संक्षिप्त परिचय प्राप्त होता है। इनमें मुनि राजचंद्र जी भी हैं। इन्होंने राजस्थान में पद विहार कर जन-जन तक अपनी वाणी के माध्यम से जनजागरण किया है। इन्होंने भी हिन्दी साहित्य में सृजन कर धर्म प्रभावना के दीप प्रज्वलित किए। इससे जैन जन लाभान्वित हुए। जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में 41वीं कड़ी में श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का मुनिश्री राजचंद्र के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..
इंदौर। राजस्थान के जैैन संतों की समृ़द्ध श्रंखला के तहत कई संतों का संक्षिप्त परिचय प्राप्त होता है। इनमें मुनि राजचंद्र जी भी हैं। इन्होंने राजस्थान में पद विहार कर जन-जन तक अपनी वाणी के माध्यम से जनजागरण किया है। इन्होंने भी हिन्दी साहित्य में सृजन कर धर्म प्रभावना के दीप प्रज्वलित किए। इससे जैन जन लाभान्वित हुए। 17वीं शताब्दी में अंतिम चरण में खूब सारा साहित्य लिखा गया है। जिनमें मुनि राजचंद्र जी ने भी साहित्य रचा। जैन संत राजचंद्र मुनि थे, लेकिन ये किसी भट्टारक के शिष्य थे अथवा स्वतंत्र रूप से विहार करते थे। इसकी अभी कोई जानकारी प्राप्त नहीं हो सकी है। ये 17वीं शताब्दी के विद्वान थे। इनकी अभी तक एक रचना चंपावती सील कल्याणक ही उपलब्ध हुई है। जिसको संवत 1684 में समाप्त किया गया था। इस कृति की एक प्रति दिगंबर जैन खंडेलवाल मंदिर उदयपुर के शास्त्र भंडार में संग्रहित है। रचना में 130 पद्य हैं। इसके अंतिम दो पद्य में उन्होंने लिखा है कि…
सुविचार धरी तप करि, ते संसार समुद्र उत्तरि।
नर नारी सांभलि जे रास, ते सुख पांमि स्वर्ग निवास।
संवत सोल चुरासियि एह, करो प्रबंध श्रावण वदि तेह।
तेरस दिन आदित्य सुद्ध वेलावहि,मुनि राजचंद्र कहि हरखज लहि।













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