समाचार

उत्तम तप का प्रेरणास्पद उदाहरण : आचार्यश्री के जीवन में उत्तम तप के कई प्रेरक प्रसंग


जैन धर्म में बारह (12) तरह के तपाचरण का उल्लेख मिलता है। इनमें छः बाह्य तथा छः आभ्यांतर तप माने गए हैं। पिछली सदी के महान उपसर्ग विजेता समाधिस्थ आचार्य 108 श्री शांतिसागर जी महाराज के जीवन में घटित हुए अनेक प्रसंग ऐसे हैं जो उनकी कठिन तपश्चर्या के प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। पढ़िए प्रदीप जैन की रिपोर्ट…


जैन धर्म में बारह (12) तरह के तपाचरण का उल्लेख मिलता है। इनमें छः बाह्य तथा छः आभ्यांतर तप माने गए हैं। पिछली सदी के महान उपसर्ग विजेता समाधिस्थ आचार्य 108 श्री शांतिसागर जी महाराज के जीवन में घटित हुए अनेक प्रसंग ऐसे हैं जो उनकी कठिन तपश्चर्या के प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

एक बार वे दक्षिण में किसी दिगम्बर मंदिर में तपस्या कर रहे थे। उनका यह तप निद्राविजय के लिए किया जा रहा था। आचार्यश्री तपस्यारत थे, शाम का समय हुआ तो किसी पुजारी ने दीपक में तेल भरकर दीपक जला दिया। थोड़ी ही देर में वहां चींटियों का प्रकोप शुरू हो गया। आचार्यश्री मूर्तिवत निश्चल मुद्रा धारक करके विराजमान थे। चींटियां आचार्यश्री के शरीर पर विचरण करने लगीं। आचार्यश्री ध्यानमग्न थे इसलिए उन्हें चीटिंयों के शरीर पर चलने का कोई भान ही नहीं हुआ। चींटियां पौरूषअंग और नितंब के हिस्से में काटने लगीं। चींटियों का हमला इतना विकट था कि शरीर के उस भाग से रक्त बहने लगा। आचार्यश्री ध्यानमग्न निश्चल बैठे रहे। रात को पुजारी को स्वप्न आया कि आचार्य महाराज को कोई शारीरिक कष्ट हो रहा है। मंदिर जंगल में था। आचार्यश्री जिस मंदिर में ध्यान मुद्रा धारण कर बैठे थे वह जंगल में था।

इस मंदिर के आसपास शेरों का आना जाना लगा रहता था। शेर का डर था इसलिए पुजारी ने एक और श्रावक को साथ ले जाने के लिए उठाया तो उसने साथ में जाने से मना कर दिया। इस तरह पुजारी और श्रावक दोनों ही नहीं गए और अपने घर में सोए रहे। सुबह होते ही पुजारी और अन्य श्रावक जब मंदिर में पहुंचे तो देखा की आचार्य श्री शांतिसागर महाराज के पूरे शरीर पर चींटियों का प्रकोप हो रहा है। उनका शरीर सूज गया और खून निकल रहा है। उन लोगों के आंखों में आचार्यश्री के शरीर पर हुए उपसर्ग को देखकर आंसू आ रहे थे। श्रावकों में आचार्यश्री के शरीर को चींटियों से मुक्त करने के लिए कुछ दूर पर गुड़ और शक्कर रख दिया। चींटियों से पूरी तरह मुक्त होने के बाद श्रावकों ने आचार्यश्री की यथायोग्य वैयावृत्ति की और उपसर्ग का निवारण किया। आचार्यश्री के जीवन में उत्तम तप ऐसे कई प्रेरक प्रसंग हैं।

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
1
+1
0
+1
0
Shreephal Jain News

About the author

Shreephal Jain News

Add Comment

Click here to post a comment

You cannot copy content of this page