आज से लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व, जब समाज कर्मकांडों और बाहरी आडंबरों में उलझा था, तब कुंडलपुर के राजप्रासाद में एक ऐसी चेतना ने जन्म लिया जिसने शस्त्र नहीं, बल्कि ‘शास्त्र’ और ‘स्वयं’ को जीतने का मार्ग दिखाया। श्रीफल जैन न्यूज की श्रृंखला के तहत आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित प्रस्तुति…
इंदौर। नगर में महावीर जयंती पर श्रद्धा, आस्था और भक्ति का अपार उत्साह और उल्लास है। शासन नायक भगवान महावीर के जन्मोत्सव पर श्री दिगंबर जैन मंदिरों में सोमवार को विशेष अभिषेक, शांतिधारा की जा रही है। विश्वभर में भगवान महावीर को याद किया जा रहा है। उनके पांच सिद्धान्तों को जीवन में उतारने का संकल्प भी लिया जा रहा है। विदित है कि आज से लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व, जब समाज कर्मकांडों और बाहरी आडंबरों में उलझा था, तब कुंडलपुर के राजप्रासाद में एक ऐसी चेतना ने जन्म लिया जिसने शस्त्र नहीं, बल्कि ‘शास्त्र’ और ‘स्वयं’ को जीतने का मार्ग दिखाया। भगवान महावीर का जन्म केवल एक तीर्थंकर का अवतार नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर दबे ‘अरिहंत’ को जगाने की एक वैश्विक उद्घोषणा थी।
राजसी वैभव से ‘वीर’ बनने की अनसुनी यात्रा
वर्धमान के जीवन की एक कम चर्चित घटना उनके ‘वीर’ नामकरण से जुड़ी है। कहा जाता है कि जब वे युवा थे, तब एक मदमस्त हाथी ने महल की ओर रुख किया। जहाँ बड़े-बड़े योद्धा सहम गए, वर्धमान ने न क्रोध किया, न अस्त्र उठाया। वे शांत भाव से हाथी के सम्मुख खड़े हो गए। उनकी आँखों की करुणा और स्थिरता ने उस विशाल जीव के अहंकार को शांत कर दिया। इसी ‘आंतरिक बल’ के कारण उन्हें ‘महावीर’ कहा गया। यह घटना सिखाती है कि वीरता दूसरों को डराने में नहीं, बल्कि भय को जड़ से मिटाने में है।
साधना के वे बारह वर्ष: जब पत्थर भी पिघल गए
अक्सर हम महावीर के केवल निर्वाण और उपदेशों की बात करते हैं, लेकिन उनके दीक्षा के बाद के 12 वर्षों का मौन एक अनछुआ अध्याय है। वे केवल जंगलों में नहीं रहे, बल्कि उन्होंने अपनी इंद्रियों के साथ एक ‘महायुद्ध’ लड़ा। चंडकौशिक सर्प की कथा प्रसिद्ध है, लेकिन उसका सार यह है कि महावीर ने विषैले नाग को नहीं, बल्कि उसके भीतर की ‘प्रतिशोध की अग्नि’ को शांत किया। उन्होंने सिखाया कि यदि आपके भीतर वैर नहीं है, तो सारा जगत आपके लिए मित्रवत हो जाता है।
अनेकांतवाद: वैचारिक लोकतंत्र का बीजारोपण
आज की ध्रुवीकृत दुनिया में महावीर का ‘अनेकांतवाद’ सबसे सटीक समाधान है। उन्होंने कहा था कि सत्य किसी एक की जागीर नहीं है। एक ही वस्तु को देखने के अनंत नजरिए हो सकते हैं। इसे ‘स्याद्वाद’ के माध्यम से उन्होंने दुनिया को समझाया। यदि हम दूसरे के दृष्टिकोण को समझने की कोशिश करें, तो दुनिया से सारे वैचारिक युद्ध समाप्त हो सकते हैं। यह विचार आज के ‘सहिष्णुता’ और ‘लोकतंत्र’ का मूल आधार है।
पर्यावरण और अर्थशास्त्र: महावीर की दूरदृष्टि
महावीर ने ‘अपरिग्रह’ का सिद्धांत दिया। लोग इसे केवल त्याग समझते हैं, जबकि यह एक महान आर्थिक और पर्यावरणीय दर्शन है। उन्होंने कहा था— “उचित से अधिक संचय ही दुःख का कारण है।” यदि आज हम अपनी जरूरतों को सीमित कर लें, तो न ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्या होगी और न ही आर्थिक असमानता। उनका ‘अहिंसा’ का सिद्धांत केवल इंसानों तक सीमित नहीं था, उन्होंने वनस्पति और जल में भी जीव देखा। वे आधुनिक युग के पहले सच्चे ‘इकोलॉजिस्ट’ थे।
निष्कर्ष: जन्म कल्याणक की सार्थकता
भगवान महावीर का जन्म कल्याणक केवल दीप जलाने या जुलूस निकालने का पर्व नहीं है। यह अपने भीतर झाँकने का दिन है। महावीर कोई अतीत की मूर्ति नहीं, बल्कि वर्तमान की अनिवार्य आवश्यकता हैं। उनका संदेश सरल है— “जीओ और जीने दो।” लेकिन इसका गहरा अर्थ है कि खुद भी गरिमा के साथ जियो और दूसरों के अस्तित्व का भी उतना ही सम्मान करो।
इस महावीर जयंती पर, आइए हम अपनी चेतना की धूल झाड़ें और महावीर के उस ‘मौन’ को सुनने का प्रयास करें, जो चीख-चीख कर कह रहा है— “विजय बाहर नहीं, भीतर है।”













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