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भगवान अनंतनाथ जन्म एवं तप कल्याणक: इंदौर के जिनालयों में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब


जैन धर्म के 14वें तीर्थंकर भगवान अनंतनाथ जी का जन्म एवं तप कल्याणक महोत्सव आज, 14 मई (ज्येष्ठ कृष्ण द्वादशी) को इंदौर के सभी दिगंबर जैन मंदिरों में पूर्ण श्रद्धा, भक्ति और हर्षाेल्लास के साथ मनाया जा रहा है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष प्रस्तुति के तहत आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित रिपोर्ट…


इंदौर। जैन धर्म के 14वें तीर्थंकर भगवान अनंतनाथ जी का जन्म एवं तप कल्याणक महोत्सव आज, 14 मई (ज्येष्ठ कृष्ण द्वादशी) को इंदौर के सभी दिगंबर जैन मंदिरों में पूर्ण श्रद्धा, भक्ति और हर्षाेल्लास के साथ मनाया जा रहा है। सुबह से ही जिनालयों में अभिषेक, शांतिधारा और विशेष पूजन-अर्चन का क्रम जारी है। भक्तगण भगवान के वैराग्य और आत्म-कल्याण के मार्ग को याद कर जीवन को सार्थक बनाने का संकल्प ले रहे हैं।

अयोध्या की पावन धरा पर जन्म और राजसी वैभव का त्याग

जैन पुराणों के अनुसार, भगवान अनंतनाथ जी का जन्म इक्ष्वाकु वंश के महाराज सिंहसेन और माता सुयशा के यहाँ पवित्र नगरी अयोध्या में ज्येष्ठ कृष्ण द्वादशी के महान दिन हुआ था। प्रभु के शरीर का वर्ण सुवर्ण के समान कांतिमय था। उनका चिह्न ‘भालू’ (ऋक्ष) है, जो शक्ति और दृढ़ता का प्रतीक है। उन्होंने लंबे समय तक न्यायप्रिय राजा के रूप में प्रजा का संचालन किया। संसार की नश्वरता को देखकर उन्हें वैराग्य उत्पन्न हुआ। उन्होंने राजसी ठाट-बाट को तिनके के समान छोड़ दिया। ज्येष्ठ कृष्ण द्वादशी के ही दिन उन्होंने दीक्षा (तप) अंगीकार की।

तीन वर्ष की कठोर साधना और केवलज्ञान की प्राप्ति

दीक्षा लेने के बाद भगवान अनंतनाथ ने तीन वर्षों तक मौन रहकर कठिन आत्म-साधना की। उन्होंने भूख, प्यास, सर्दी और गर्मी के परीषहों को समभाव से सहा। ध्यान की गहराई में उतरकर उन्होंने चारों घातिया कर्मों का क्षय किया। चैत्र कृष्ण अमावस्या के दिन उन्हें श्केवलज्ञानश् (परम ज्ञान) की प्राप्ति हुई। केवलज्ञान के बाद समवशरण में उनकी दिव्यध्वनि खिरी। उन्होंने संसार के प्राणियों को मुक्ति का शाश्वत मार्ग दिखाया।

जैन धर्म की पुनर्स्थापना और धर्म चक्र का प्रवर्तन

जैन धर्म अनादि-निधन है, लेकिन समय-समय पर तीर्थंकर आकर धर्म की पुनर्स्थापना करते हैं। भगवान अनंतनाथ ने अपने युग में शिथिल होते जा रहे धर्म मार्ग को पुनर्जीवित किया। उन्होंने ‘अहिंसा परमो धर्मः’ के सिद्धांत को दृढ़ता से स्थापित किया। उनके समवशरण में 50 गणधर थे, जिनमें यश धीर जी मुख्य थे। उन्होंने चतुर्थ काल में मत-मतांतरों के अंधकार को दूर किया। सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र की महत्ता बताई। उनके काल में लाखों जीवों ने आत्म-कल्याण का मार्ग चुना।

श्रावक-श्राविकाओं के लिए भगवान अनंतनाथ का दिव्य संदेश

भगवान अनंतनाथ जी का संपूर्ण जीवन और उनकी देशना श्रावक-श्राविकाओं के लिए व्यावहारिक मार्गदर्शिका है। उनका मुख्य संदेश श्अनंतश् आत्म-शक्तियों को जगाने का है। सीमित इच्छाएं, असीम शांतिरू भौतिक वस्तुएं कभी अनंत तृप्ति नहीं दे सकतीं। इच्छाओं को सीमित करके ही शाश्वत सुख पाया जा सकता है। अहिंसा और करुणारू संसार के सभी छोटे-बड़े जीवों के प्रति मन, वचन और काय से दया का भाव रखें। तप और स्वाध्याय प्रतिदिन आत्म-निरीक्षण करें। वासनाओं और कषायों (क्रोध, मान, माया, लोभ) को तप की अग्नि में भस्म करें। सत्य और अपरिग्रहरू संचय की प्रवृत्ति का त्याग कर परोपकार में जीवन लगाएं। आज इस पावन कल्याणक महोत्सव पर इंदौर का जैन समाज भगवान अनंतनाथ जी के चरणों में शत-शत नमन करते हुए उनके बताए आत्म-कल्याण के मार्ग पर चलने का संकल्प दोहरा रहा है।

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