भारत के इतिहास में अनेक सम्राट हुए, जिन्होंने तलवार के बल पर साम्राज्य खड़े किए, सीमाएँ बढ़ाईं और विजय के ध्वज फहराए। किन्तु इतिहास में बहुत कम ऐसे सम्राट हुए, जिन्होंने सत्ता के शिखर से उतरकर आत्मा की शांति को अपनाया। चंद्रगुप्त मौर्य उन्हीं विरले व्यक्तित्वों में से एक हैं। आज पढ़िए, डॉ. जयेन्द्र जैन ‘निप्पू’ शास्त्री का यह आलेख…
चंदेरी। भारत के इतिहास में अनेक सम्राट हुए, जिन्होंने तलवार के बल पर साम्राज्य खड़े किए, सीमाएँ बढ़ाईं और विजय के ध्वज फहराए। किन्तु इतिहास में बहुत कम ऐसे सम्राट हुए, जिन्होंने सत्ता के शिखर से उतरकर आत्मा की शांति को अपनाया। चंद्रगुप्त मौर्य उन्हीं विरले व्यक्तित्वों में से एक हैं। पाटलिपुत्र के सिंहासन से लेकर श्रवणबेलगोला की शांत पहाड़ियों तक की उनकी यात्रा केवल एक राजा की यात्रा नहीं थी, वह मनुष्य के भीतर सत्ता से साधना की ओर बढ़ते आत्मसंघर्ष की यात्रा थी।
जब साम्राज्य छोटा पड़ गया
कहा जाता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य ने सम्पूर्ण आर्यावर्त को एक सूत्र में बाँध दिया था।
उनके सामने यवन शक्तियाँ झुकीं, नन्द साम्राज्य समाप्त हुआ और मौर्य ध्वज पूरे भारत में लहराया। किन्तु जीवन का सबसे बड़ा प्रश्न युद्धभूमि में नहीं, मनुष्य के भीतर खड़ा होता है। जैन परंपरा कहती है कि जब आचार्य भद्रबाहू ने भीषण अकाल की भविष्यवाणी की, तब चन्द्रगुप्त ने राजसिंहासन छोड़ दिया। कल्पना कीजिए कृ जिस व्यक्ति के एक आदेश पर लाखों सैनिक चल पड़ते हों, वह स्वयं नंगे पाँव एक मुनि के पीछे चल पड़ा होगा। यह केवल त्याग नहीं, यह आत्मा का जागरण था।
चन्द्रगुप्त बसदि, मौन में खड़ा इतिहास
चन्द्रगिरि पहाड़ी पर स्थित चंद्रगुप्त बसदि जैन स्थापत्य और इतिहास का अद्भुत संगम है। पत्थरों से निर्मित यह प्राचीन बसदि केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि वैराग्य की जीवित स्मृति प्रतीत होती है। यहाँ के स्तंभों पर उकेरी गई नक्काशी, शांत गर्भगृह और साधना का वातावरण आज भी आगंतुकों को सदियों पीछे ले जाता है।
भद्रबाहु गुफा- जहाँ मौन बोलता है
भद्रबाहू गुफा वह स्थान माना जाता है जहाँ आचार्य भद्रबाहु ने तपस्या की।
जैन परंपरा के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य ने भी यहीं संयम और ध्यान का जीवन जिया।
गुफा की सादगी मानो यह संदेश देती है कि आत्मा का प्रकाश वैभव से नहीं, त्याग से प्रकट होता है।
शिलालेख और निशिधियाँ पत्थरों में जीवित स्मृतियाँ
चंद्रगिरि पहाड़ी पर अनेक प्राचीन शिलालेख और निशिधि स्मारक स्थित हैं।
इन अभिलेखों में भद्रबाहु और चंद्रगुप्त की परम्परा के संकेत मिलते हैं। निशिधि स्तम्भ उन साधकों की स्मृति में बनाए जाते थे जिन्होंने संलेखना द्वारा शांतिपूर्वक देह त्याग किया। इन पत्थरों को देखकर लगता है मानो समय स्वयं ध्यानस्थ होकर बैठ गया हो।
भारत को यह कहानी फिर पढ़नी होगी। आज का युग वैभव, शक्ति और प्रदर्शन का युग बनता जा रहा है। ऐसे समय में चन्द्रगुप्त मौर्य की यह कथा केवल धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि भारतीय आत्मा का दर्पण है। यह हमें बताती है कि- सत्ता अंतिम सत्य नहीं, वैराग्य पलायन नहीं, और आत्मसंयम कमजोरी नहीं होता। जब एक सम्राट संलेखना का मार्ग चुनता है, तब वह संसार को यह संदेश देता है कि आत्मा की शांति किसी भी साम्राज्य से बड़ी होती है। राज्य जीतने वाले बहुत हुए, पर स्वयं को जीतने वाले विरले होते हैं।













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