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विदेशों की नौकरी छोड़ अपने नगर में करे व्यवसाय: संतति के विदेश गमन पर मुनिश्री ने जताई चिंता 


मुनि श्री संभव सागर जी ने संतान उत्पत्ति पर चिंता प्रकट करते हुए कहा कि आज हम इतने बड़े-बड़े और अच्छे सुव्यवस्थित घर तो बना रहे हैं लेकिन, उसमें रहने वाले मात्र पति और पत्नी हैं। संतान कहां है तो वह या तो पूना, बैंगलुरू अथवा विदेश में सर्विस कर रहे हैं। यंहा पर मंदिरों में भी पूजा करने वाले युवक-युवतियों की संख्या न के बराबर है। विदिशा से पढ़िए, यह खबर…


विदिशा। मुनि श्री संभव सागर जी ने संतान उत्पत्ति पर चिंता प्रकट करते हुए कहा कि आज हम इतने बड़े-बड़े और अच्छे सुव्यवस्थित घर तो बना रहे हैं लेकिन, उसमें रहने वाले मात्र पति और पत्नी हैं। संतान कहां है तो वह या तो पूना, बैंगलुरू अथवा विदेश में सर्विस कर रहे हैं। मंदिरों में भी पूजा करने वाले युवक-युवतियों की संख्या न के बराबर है। ऐसी स्थिति में यह धर्म का रथ कैसे आगे बढ़ेगा। मुनि श्री ने कहा कि जिस समाज की जनसंख्या कम है। वह विलुप्ति के कगार पर है। उन्होंने उदाहरण के तौर पर पारसी समाज का उदाहरण दिया कि टाटा जैसे बड़े-बड़े उद्योगपति पारसी समाज से आते हैं। आज उनकी गिनती उंगलियों में गिनने लायक हो गई है। यदि जैन समाज ने अपनी संतति पर ध्यान नहीं दिया तो आने वाले समय में आपकी गिनती भी विलुप्त होंने की ओर हो जाएगी। उन्होंने कहा कि जिस समाज में 2.2 की वृद्धि नहीं है वह धीरे-धीरे डिक्रीज हो रही है। वर्तमान समय में जैन समाज की जनसंख्या 2 प्रतिशत से कम है। उन्होंने कहा कि पश्चिमी सभ्यता का असर बढ़ता जा रहा है और अब तो शादी विवाह जैसे पवित्र बंधन भी लोगों को बोझ लगने लगने है। मुनि श्री ने कहा कि इस प्रकार से रिलेशनशिप को बढ़ाओगे तो आप पशुतुल्य हो जाओगे।

उन्होंने कहा कि अभी भी संभलने का मौका है। अपनी संतान को अच्छे संस्कार दो और इस प्रकार की पाश्चात्य संस्कृति से दूर रहो तथा समाज की जनसंख्या को बढ़ाने के बारे में भी विचार करना चाहिए। मुनि श्री ने कहा कि यदि भारत के बच्चे विदेशों में पढ़ने और नौकरी करने चले गए तो हमारी संस्कृति का क्या होगा? जिस भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था, उस भारत को लूटने का काम विदेशियों ने नहीं समझदार लोगों ने किया है। सुनते है कि आजकल विदेशों से भारतीयों को निकाला जा रहा है, लेकिन फिर भी हम यदि उसे स्वीकार करते है तो अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मार रहे है।

आचार्य गुरुदेव ने इस बारे में एक हायकू लिखा है कि ‘उड़ना भूली चिड़िया, सोने की, उठ उड़ जा… मुनि श्री ने कहा कि अभी भी समय है। हम लोग विदेशों की नौकरी का प्रलोभन छोड़ अपने ही देश में अपना ही कारोबार करेंगे तो अपने समाज की उन्नति करने में सहायक सिद्ध होंगे। यह जानकारी प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने दी।

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