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जीव कल्पना में जी रहा, वास्तविकता में नहींः मुनि श्री आदित्य सागर जी

  • सत्य में ही छिपा है आनंद
  • समोसरण मंदिर, कंचन बाग में प्रवचन

 

न्यूज सौजन्य- राजेश जैन दद्दू

इंदौर। संसारी जीव कल्पना में जी रहा है वास्तविकता में नहीं। जो आपको सुख लग रहा है वह दूसरों को दुख लग रहा है। मोक्षमार्ग में जाना है तो कल्पना में मत जियो, वास्तविकता में जियो। मनुष्य पर्याय दृष्टि से मनुष्य है लेकिन जीव दृष्टि से द्रव्य है। हमें पर्याय दृष्टि और दिव्य दृष्टि दोनों को अपने अंदर रखना चाहिए। यह उद्गार मुनि श्री आदित्य सागर जी महाराज ने मंगलवार को समोसरण मंदिर, कंचन बाग में प्रवचन देते हुए व्यक्त किए। आपने कहा कि असत्य को सत्य मानना राग है और सत्य को असत्य मानना द्वेष है।
आदित्य सागर जी महाराज ने यह भी कहा कि असत्य में संकल्प विकल्प है, सत्य में आनंद है। सुख तो तुम्हारे भीतर ही है। कल्पना तुम्हारी बाहर चल रही है। इंद्रियों के द्वारा ग्रहण किया सुख दुख ही है। सुख तो स्व-द्रव्य में है, पर-द्रव्य में नहीं। पर द्रव्य से जब तक मोह नहीं छूटेगा, तब तक स्व-द्रव्य का सुख प्राप्त नहीं होगा। आपने कहा कि जिसका जो नियोग है, उसका उसके साथ संयोग है। जिस जीव का जब वियोग होना है वह होकर रहेगा। उसे कोई टाल नहीं सकता। इसलिए न रोना, न मुस्कुराना- मध्यस्थ होकर जीना। बुद्धिमान जीव का कर्तव्य है कि वह सुख को सुख माने और दुख को दुख माने लेकिन पर-द्रव्य के संयोग को सुख ना माने और उसके वियोग को भी दुख नहीं माने। कल्पना असत्य की मत कर लेना। कल्पना सुखों में सुख की करना, दुखों में सुख की कल्पना करके संसार में मत भटकना।
प्रारंभ में स्वतंत्र भैया, भरत भैया ,बाहुबली भैया, डी के सराफ ने मांगलिक क्रियाएं संपन्न की। पंडित रतनलाल जी शास्त्री, कैलाश वेद आजाद जैन जीवनलाल जैन आदि समाज जन उपस्थित थे संचालन श्री हंसमुख गांधी ने किया।

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