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ऐसे विचार, जो जिनवाणी से मेल नहीं रखते, उससे कल्याण नहीं

  • श्रमण मुनि श्री शुद्धसागर जी महाराज के उद्गार
  • अमृतचंद स्वामी द्वारा रचित पुरुषार्थ सिद्धि उपाय ग्रंथ का स्वाध्याय जारी

न्यूज़ सौजन्य- इशिता जैन

रावतभाटा (चितौड़गढ़)। श्रमण मुनि श्री शुद्धसागर जी महाराज जी संसघ का मंगलमय चातुर्मास रावतभाटा, चितौड़गढ़ में चल रहा है। मुनि श्री संघ श्री 1008 पारसनाथ दिगम्बर जैन मंदिर, नया बाजार रावतभाटा में विराजमान हैं। मुनि श्री द्वारा आचार्य अमृतचंद स्वामी द्वारा रचित पुरुषार्थ सिद्धि उपाय ग्रंथ की स्वाध्याय करवाया जा रहा है।

मुनि श्री शुद्धसागर जी महाराज ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि हे जीव हमारी सोच, विचार, मान्यता सभी समिचित हैं जिसे हमने दूसरों से उधार लिया है और वही हम कर रहे हैं। मनुष्य की ऐसी कई धारणाएं हैं जो तीर्थंकर की देशना अर्थात जिनवाणी से बिल्कुल अलग होती हैं। ऐसे विचार, जो जिनवाणी से बिल्कुल ही नहीं मिलते हों, उससे हमारा कल्याण बिल्कुल ही संभव नहीं है। मुनि श्री ने श्रोताओं को समझाते हुए कहा कि जिस प्रकार कुएं का पानी शुद्ध होता है, उसमें अनेक गुण होते हैं परन्तु यदि उसमें थोड़ा सा विष डाल दिया जाए तो उस पानी के सारे गुण समाप्त हो जाते हैं। उसी प्रकार जीव धर्म को जानता नहीं है फिर भी वह तन- मन – धन से धर्म के प्रति समर्पित है तो वह धर्म को जाने बिना अपनी अहिंसा से धर्म के विपरीत ही कार्य करता है। धर्म सभा को संबोधित करते हुए गुरुवर ने कहा कि जहां धर्म होता है, वहां अहिंसा का पालन होता है और जहां जहां अधर्म होता है वहां हिंसा का पालन होता है।

जैनियों के लक्षण बताते हुए मुनि श्री ने कहा कि जैनी कभी भी बिना छना जल नहीं पीता है क्योंकि ग्रन्थों और वैज्ञानिक दोनों तरीके से यह प्रमाणित हो चुका है कि पानी की एक बूंद में असंख्यात जीव होते हैं।

उन्होंने कहा कि यदि हम दूसरों को देखकर धर्म करते हैं तो ना तो हमारा धर्म बचता है ना ही धर्म करने वाला। इस प्रकार मुनि श्री कहते हैं कि हमें अपने भावों को शुद्ध रखना चाहिए तथा तीर्थंकर की देशना अर्थात जिनवाणी सुनकर दूसरों का नहीं, बल्कि निज का कल्याण करना चाहिए। मुनि श्री ने बताया कि महावीर की अहिंसा अत्यंत सूक्ष्म है। उसका इतनी आसानी से पालन नहीं किया जा सकता है।

धर्मसभा में रावतभाटा श्री समाज के पुरुष वर्ग,महिला वर्ग, बालक- बालिकाएं उपस्थित थे।

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