दिन रविवार यानी 18 मई। अवसर अंतर्मुखी मुनिश्री पूज्यसागर जी महाराज का विहार करते हुए जन्मभूमि पीपलगोन में भव्य मंगल प्रवेश का। इंदौर से सुबह 6 बजे बस में सवार होकर यात्रा आरंभ हुई। यह अनूठा अनुभव रहा। श्रीजी के जयकारों के साथ भजन-भक्ति करते हुए पीपलगोन पहुंचे। नगर से करीब एक किमी पहले अंतर्मुखी मुनिश्री पूज्यसागर जी महाराज के दर्शन पाकर धन्य-धन्य हुए। इंदौर से पढ़िए, यह स्पेशल रिपोर्ट…
इंदौर। 18 मई रविवार को अंतर्मुखी मुनिश्री पूज्यसागर जी महाराज का मुनि दीक्षा के 12 वर्षों बाद पहली बार अपने गृहग्राम जन्मभूमि स्थल पीपलगोन में मंगल प्रवेश होने जा रहा था। जितना उत्साह, जितनी उमंग पीपलगोन वासियों में थी। उससे कहीं अधिक इंदौर दिगंबर जैन समाज के मुनि भक्तों, गुरु भक्तों में देखने में आई। इंदौर से जब सुबह 6 बजे के करीब बस पीपलगोन की ओर रवाना हुई तो पूरी बस जयकारों से गूंज उठी। हर भक्त के हाथ तालियों के साथ भजन-भक्ति में लयबद्ध हो रहे थे। पीपलगोन पहुंचने के बाद तो भक्ति अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच चुकी थी। बैंडबाजों पर नृत्य करते मुनि भक्तों ने मुनिश्री को कार्यक्रम स्थल पांडाल तक लेकर आए। इस बीच जगह-जगह ग्रामीणों और समाजजनों ने मुनिश्री के पाद प्रक्षालन किए। भक्ति का यह अद्भुत दृश्य पीपलगोन की पावन धरती को गौरवान्वित कर रहा था।
अंतर्मुखी मुनिश्री पूज्यसागरजी महाराज ने यहां पहुंचने के बाद सबसे पहले मंदिर में जाकर भगवान के दर्शन किए। वहां से आने के बाद मंचासीन होकर सभी जैन-अजैन भक्तों को आशीवर्चन से उपकृत किया। पाद पूजन, श्रीफल भेंट, अर्घ्य अर्पण के साथ गुरु शास्त्र देव पूजन, शास्त्र भेंट आदि के नियमित विधान संपन्न कराए गए। इस दौरान आराधना और भक्ति का ऐसा दौर देखने में आया कि पूरा पांडाल आचार्यों, मुनिराजों और गुरुवर के जयकारों से गूंजायमान हो गया। यह देखना, अनुभूतना अपने आप में अलौकिक पल से कम नहीं रहा।
मुनिश्री की प्रकृति, संस्कृति और धर्म के रक्षार्थ देशना
मुनिश्री पूज्यसागर जी महाराज ने यहां धर्मसभा में प्रकृति, संस्कृति और अपने धर्म की रक्षार्थ जो देशना प्रस्तुत की। उसमें सबसे अधिक आध्यात्मिक चिंतन तो था ही अलौकिक शांति का संदेश भी था। अपने प्रवचन के आरंभ में ही मुनिश्री पूज्यसागर जी महाराज ने कहा कि आज समाज, प्रदेश और देश पर संकट के बादल छाए हुए हैं। धर्म और संस्कृति पर पाश्चात्य संस्कृति का हमला हो रहा है। मुनिश्री ने कहा कि निश्चित रूप से तीर्थंकरों की धरती है। महात्माओं की धरती है। जो राम और महावीर हमें धर्म बता कर गए हैं। उसे सुरक्षित रखना है तो हमें कृष्ण का रूप धारण करना पड़ेगा। अब विचार करें कि व्यक्ति उसे समय भी यहां की लोक के माध्यम से मरण को प्राप्त कर सकता है आने वाली पीढ़ी को सुरक्षित रखना है, हमारी संस्कृति को कोई नुकसान पहुंचाए, परिवार को नुकसान पहुंचाएगा उससे बचाने के लिए हमें आगे आना होगा। मुनिश्री ने कहा कि इस धरती पर गर्मी का वातावरण बनेगा तो इंसानों का बाहर निकलना मुश्किल हो जाएगा। धरती मां की बात हो, चाहे भगवान की बात हो उसका संरक्षण करना हमारा काम है। हम भगवान की आराधना करें। हम पूजा करते हैं, अभिषेक करते हैं। पाठ करते हैं, हम गुरु की वंदना करते हैं।
हम उसके साथ कर्तव्य निभाएं। आने वाले समय में अगर हम प्रकृति के प्रति व्यक्ति उदासीनता भाव रहा तो निश्चित रूप से कहता हूं कि हमें अपने जेब में ऑक्सीजन के छोटे-छोटे सिलेंडर लेकर घूमना पड़ेंगे। इस समय के अनुसार धर्म के प्रति आस्थाएं श्रद्धाएं तो कम हो रही हैं। मैं आपसे पूछना चाहता हूं क्या आपने अपने बच्चों के लिए मकान बनाया होगा। खेत खरीदा होगा, लेकिन आने वाली पीढ़ी के लिए ऑक्सीजन की व्यवस्था की है। पर्यावरण की रक्षा के लिए, धरती की रक्षा के लिए हमें अधिक से अधिक पौधे लगाकर उनका लालन पालन करना होगा। खेतों की मेढ़ पर पौधे लगाकर उन्हें पेड़ बनने तक रक्षा करें। मुनिश्री ने कहा कि पीपलगोन में भी बड़े पैमाने पर पौधे लगाकर हरियाली की जाएगी। इसका संकल्प लेना होगा।













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