इंदौर में 28 जुलाई से प्रारंभ होने वाले चातुर्मास के दौरान दिगंबर परंपरा के 9 संत संघ विभिन्न क्षेत्रों में विराजमान रहेंगे। कुल 98 साधु-साध्वियों के सानिध्य में धार्मिक, आध्यात्मिक और सामाजिक गतिविधियाँ संचालित होंगी। पढ़िए श्रीफल समूह संपादक रेखा संजय जैन की यह विशेष स्टोरी ।
इंदौर। वर्षा ऋतु के साथ इंदौर एक बार फिर धर्म, साधना और अध्यात्म की राजधानी बनने जा रहा है। 28 जुलाई से 8 नवंबर तक चलने वाले चातुर्मास के दौरान शहर के विभिन्न क्षेत्रों में दिगंबर जैन परंपरा के 9 संघों के कुल 98 संत विराजमान रहेंगे। चार माह तक चलने वाले इस आध्यात्मिक पर्व में प्रतिदिन प्रवचन, स्वाध्याय, तप, उपवास, विधान, संस्कार शिविर और अनेक धार्मिक आयोजन होंगे, जिनमें हजारों श्रद्धालुओं के शामिल होने की संभावना है।
जैन परंपरा में चातुर्मास केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि संयम, आत्मचिंतन, जीवदया और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देने वाला विशेष काल माना जाता है। वर्षा ऋतु में सूक्ष्म जीवों की रक्षा के लिए साधु-संत विहार रोककर एक ही स्थान पर विराजते हैं और वहीं से समाज को धर्म, नैतिकता और संस्कारों का मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।
इंदौर में इस वर्ष विभिन्न क्षेत्रों में विराजमान होने वाले आचार्यों एवं मुनिराजों के कारण शहर के लगभग प्रत्येक प्रमुख हिस्से में धार्मिक गतिविधियां संचालित होंगी। श्रद्धालुओं को अपने क्षेत्र में ही संतों के सान्निध्य का लाभ मिलेगा।
श्रीफल समूह की संपादक रेखा संजय जैन द्वारा संकलित जानकारी के अनुसार, इस वर्ष इंदौर में निम्न संतों के चातुर्मास होंगे—
इंदौर के प्रमुख चातुर्मास स्थल









चातुर्मास क्यों है विशेष?
– वर्षा ऋतु में जीवों की रक्षा के लिए साधु-संत एक स्थान पर ही विराजते हैं।
– चार माह तक धर्म, तप, स्वाध्याय और आत्मचिंतन का विशेष अवसर मिलता है।
– समाज में नैतिकता, संस्कार, संयम और अहिंसा का संदेश प्रसारित होता है।
– पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता के प्रति संवेदनशीलता का प्रेरक संदेश मिलता है।
इस बार इंदौर का चातुर्मास केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी विशेष माना जा रहा है। शहर के विभिन्न क्षेत्रों में संतों का सान्निध्य हजारों परिवारों को धर्म, संस्कार और आत्मकल्याण से जोड़ने का माध्यम बनेगा।













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