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शीतलधाम में भव्य पंचकल्याणक महा महोत्सव 11 मार्च से : वसंतोत्सव के माध्यम से मुनि श्री संभवसागर जी महाराज का आत्मजागरण संदेश


आगामी 11 मार्च से 16 मार्च तक शीतलधाम में नवनिर्मित श्री आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में बर्रो वाले बाबा भगवान आदिनाथ को नवीन वेदी पर विराजमान करने तथा 16 नवीन जिन प्रतिमाओं के पंचकल्याणक महामहोत्सव किया जा रहा है। विदिशा से पढ़िए, राजीव सिंघई की यह खबर…


विदिशा। आगामी 11 मार्च से 16 मार्च तक शीतलधाम में नवनिर्मित श्री आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में बर्रो वाले बाबा भगवान आदिनाथ को नवीन वेदी पर विराजमान करने तथा 16 नवीन जिन प्रतिमाओं के पंचकल्याणक महामहोत्सव किया जा रहा है। यह आयोजन संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी के परोक्ष आशीर्वाद एवं आचार्य श्री समयसागर जी के मंगल आशीर्वाद से होगा। कार्यक्रम मुनि श्री संभवसागरजी महाराज, मुनि श्री निस्सीम सागरजी महाराज, मुनि श्री संस्कार सागरजी महाराज ससंघ के सान्निध्य में तथा प्रतिष्ठाचार्य बाल ब्रह्मचारी विनय भैया बंडा के निर्देशन में होगा। प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया कि पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महामहोत्सव पाषाण से भगवान बनाने की आध्यात्मिक प्रक्रिया है। इसमें भगवान के गर्भ कल्याणक से लेकर जन्म, बाल्यावस्था, युवावस्था, वैराग्य, दीक्षा, केवलज्ञान और मोक्ष तक की संपूर्ण यात्रा का सजीव मंचन विभिन्न पात्रों के माध्यम से किया जाएगा। इस महोत्सव में सौधर्म इंद्र की भूमिका कमलकुमार जैन (कमल किराना) निभाएंगे, जबकि भगवान के माता-पिता बनने का सौभाग्य अंजना जैन एवं अनिल जैन ‘हजारीलाल’ को प्राप्त हुआ है।

वसंतोत्सव के माध्यम से आत्मजागरण का संदेश

प्रातःकालीन धर्मसभा में मुनि श्री संभवसागरजी महाराज ने वसंत ऋतु के माध्यम से आध्यात्मिक संदेश प्रदान किया। उन्होंने कहा कि जब वसंत में टेसू (पलाश) के लाल-पीले पुष्प खिलते हैं तो प्रतीत होता है मानो प्रकृति स्वयं रंगोत्सव मना रही हो किंतु, यह वसंत पतझड़ का परिणाम है, जहाँ झरते पत्ते हमें अनित्यता का बोध कराते हैं। उन्होंने कहा कि मनुष्य कितना भी वैभवशाली, यशस्वी और शक्तिशाली क्यों न हो सब कुछ क्षणभंगुर है। जैसे पतझड़ के बाद वसंत आता है, वैसे ही जीवन में गिरावट के पश्चात नवसृजन संभव है। गिरना अंत नहीं, बल्कि परिवर्तन की शुरुआत है। त्याग, विनम्रता और संयम से ही मानव जीवन का वास्तविक विकास होता है।

मुनिश्री ने वर्ष 2002 की स्मृतियों का उल्लेख करते हुए बताया कि जब आचार्य श्री विद्यासागर जी प्रथम बार विदिशा पधारे थे, तब फाल्गुन मास एवं होली का पावन अवसर था। उस समय नगरवासियों ने होली के स्थान पर दीपावली जैसा उत्सव मनाकर संघ की मंगल अगवानी की थी। उन्होंने एक अन्य प्रसंग सुनाते हुए बताया कि जब आचार्यश्री का विहार आगरा से राजस्थान की ओर हो रहा था और वे मथुरा चौरासी के गंगा घाट पहुँचे, तब चारों ओर होली का उल्लास था। रंगों में सराबोर लोगों ने जब मुनिसंघ को निर्विकार भाव से विहार करते देखा तो आश्चर्य व्यक्त किया। तब आचार्यश्री ने कहा था कि आप लोगों का रंग तो फीका पड़ सकता है, किंतु साधु का रंग तप, त्याग और वैराग्य का रंग है, जो अमिट होता है। बाहरी रंग धुल जाते हैं, पर आत्मा का रंग कभी फीका नहीं पड़ता। इस अवसर पर मुनि श्री निस्सीम सागरजी महाराज ने प्रश्नमंच के माध्यम से उपस्थित जनसमुदाय के ज्ञान की परीक्षा ली तथा सही उत्तर देने वालों को पुरस्कार प्रदान किए गए। शीतलधाम में यह पंचकल्याणक महामहोत्सव आध्यात्मिक चेतना, संस्कार और आत्मजागरण का अनुपम संगम सिद्ध होगा।

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