प्राकृत भाषा विकास फाउण्डेशन द्वारा संचालित पंचवर्षीय प्राकृत अध्ययन पाठ्यक्रम (3+2) का भव्य विमोचन देश के विभिन्न स्थानों पर अत्यंत उत्साह एवं आध्यात्मिक वातावरण में हुआ। बकस्वाहा से पढ़िए, रत्नेश जैन रागी की यह रिपोर्ट…
बकस्वाहा। प्राकृत भाषा विकास फाउण्डेशन द्वारा संचालित पंचवर्षीय प्राकृत अध्ययन पाठ्यक्रम (3+2) का भव्य विमोचन देश के विभिन्न स्थानों पर अत्यंत उत्साह एवं आध्यात्मिक वातावरण में हुआ। यह ऐतिहासिक विमोचन आचार्यश्री 108 सुनीलसागरजी महाराज के पावन सान्निध्य में बड़ौदा विश्वविद्यालय में तथा उपाध्यायश्री शुभमसागरजी महाराज के सान्निध्य में अहमदाबाद सहित शाहगढ़, छतरपुर, टीकमगढ़, बम्हौरी, बकस्वाहा, हटा एवं भगवां सहित 10 स्थानों पर एक साथ हुआ। प्राकृत शिविरों के क्षेत्रीय संयोजक डॉ. निर्मल जैन शास्त्री, विजय जैन शास्त्री ने पाठ्यक्रम की विशेषताओं एवं उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह केवल भाषा सीखने का उपक्रम नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, जैन दर्शन एवं आत्मिक चेतना से जुड़ने का एक व्यापक अभियान है। उन्होंने कहा कि यह पाठ्यक्रम नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बनेगा।
पाठ्यक्रम अत्यंत सरल, रोचक
पाठ्यक्रम संयोजक डॉ. आशीष जैन शास्त्री बम्हौरी ने पाठ्यक्रम की समस्त जानकारी प्रदान करते हुए बताया कि यह पाठ्यक्रम अत्यंत सरल, रोचक एवं आधुनिक अध्ययन पद्धति पर आधारित है। विद्यार्थियों को ऑनलाइन वीडियो लेक्चर, आकर्षक पीपीटी, इन्फोग्राफिक्स, प्रश्नोत्तर सामग्री, प्राकृत संभाषण अभ्यास एवं ब्राह्मी लिपि प्रशिक्षण जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी, जिससे अध्ययन सहज एवं आनंददायी बन सके। शाहगढ़ नगर में डॉ. आशीष जैन आचार्य के मार्गदर्शन में पाठ्यक्रम का भव्य विमोचन समारोह किया गया। कार्यक्रम में विद्यार्थियों, शिक्षकों, समाजजनों एवं प्राकृत प्रेमियों की उत्साहपूर्ण सहभागिता रही।
व्यक्तित्व, संस्कार एवं आत्मविश्वास का विकास होगा
संस्था के अध्यक्ष प्रो. ऋषभचन्द जैन फौजदार ने बताया कि प्राकृत भाषा केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, जैन दर्शन और आत्मिक चेतना की अमूल्य धरोहर है। आज आवश्यकता है कि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ा जाए और प्राकृत भाषा इस दिशा में एक सशक्त माध्यम बन सकती है। उन्होंने कहा कि यह पाठ्यक्रम विद्यार्थियों को केवल ज्ञान ही नहीं देगा, बल्कि व्यक्तित्व, संस्कार एवं आत्मविश्वास का भी विकास करेगा। उन्होंने आगे कहा कि डिजिटल युग में प्राकृत को वैश्विक स्तर तक पहुँचाना संस्था का प्रमुख लक्ष्य है और यह पाठ्यक्रम उसी दिशा में एक ऐतिहासिक पहल सिद्ध होगा। संस्था द्वारा घोषित मूल संदेश हम केवल प्राकृत नहीं पढ़ रहे, हम जिनेन्द्र वाणी के माध्यम से भारत की आध्यात्मिक विरासत को गढ़ रहे हैं। उन्होंने उपस्थित जनसमूह को विशेष रूप से प्रेरित किया।













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