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सत्संगति से मिलती है सद्‌गति : आचार्य श्री विमर्श सागर जी ससंघ के आगमन से मेरठ बना सत्संग स्थल


धर्मनगरी मेरठ में सत्संग गंगा बह रही है। आचार्य श्री विमर्शसागर जी अपने विशाल चतुर्विध संघ 35 पिच्छीधारी संयमी साधक-साधिकाओं के साथ वात्सल्य, दया, करुणा, अहिंसा और धर्म के अद्‌भुत मोती लुटा रहें हैं। मेरठ से पढ़िए, सोनल जैन की यह खबर…


मेरठ। धर्मनगरी मेरठ में सत्संग गंगा बह रही है। आचार्य श्री विमर्शसागर जी अपने विशाल चतुर्विध संघ 35 पिच्छीधारी संयमी साधक-साधिकाओं के साथ वात्सल्य, दया, करुणा, अहिंसा और धर्म के अद्‌भुत मोती लुटा रहें हैं। जिन्हें प्राप्त कर मेरठ नगर का हर नागरिक अंतरंग धर्म रूपी धन से धनवान होता जा रहा है। मंगलवार को प्रातः बेला में महावीर जयंती भवन शारा रोड से मेरठ की साधु सेवा समिति आचार्य श्री ससंघ से आग्रह-निवेदन कर एवं गाजे-बाजे के साथ हर्षोल्लाह के साथ अगवानी करते हुए कमला नगर के दिगम्बर जैन मंदिर आए। मेरठ जैन समाज के यशस्वी अध्यक्ष सुरेश जैन’ ‘ऋतुराज’ ने धर्मसभा के मध्य आचार्य श्री को श्रीफल अर्पित कर कहा कि विगत 15 दिनों से आचार्य श्री ससंघ हमारे मेरठ शहर में विराजमान हैं। मुझे सुखद आश्चर्य है कि इतने विशाल संघ के साथ भी आचार्यश्री अत्यंत सरल-सहज और निर्विकल्प बने रहते हैं। सच कहूँ कि आचार्य गुरुवर हमें अंतरंग शाश्वत धन से धनवान बनाने आए हैं। जिसे जितना धनवान बनना है वह गुरुवर के चरणों आए और अपना एवं सबका हित है। धर्मसभा में उपस्थित धर्मालुओं को संबोधित करते हुये आचार्य प्रवर ने कहा कि किसी ने पूछा -गुरुवर

अच्छी गति कैसे प्राप्त होगी? मैंने कहा- यदि चाहिए आपको अच्छी गति तो करनी होगी अवश्य ही सत्संगति। आपको सच्चे देव-शास्त्र-गुरु की संगति करना होगी। उनकी निकटता प्राप्त करना होगी। फिर पूछा क्या केवल निकटता प्राप्त करना ही सत्संगति है? मैंने कहा प्रथम तो निकटता ही प्राप्त करना चाहिए पुनः सद्‌गुरु की निकटता से जो सीखा हो उसे अपने जीवन में स्वीकार करना, उसे अपना आचरण बनाना, बस यही सत्संगति है। बन्धुओं, आज तक जितने पुरुष महापुरुष बने हैं, वे एकमात्र सत्संगति से ही बने हैं। क्योंकि यदि गलियों का गंदा पानी भी गंगाजल में मिल जाये तो वह भी पवित्रता को प्राप्त हो जाता है। ध्यान रखना, जीवन में क्षणभर की सत्संगति भी पूरे जीवन को सार्थक कर देती है। जीवन के अन्तिम क्षण में भी यदि सद्‌गुरु के दो वचन भी आपके कान में पड़ जायें और आप उन्हें श्रद्धाা से श्रवण कर लें तो भी जीवन भर में किये पाप भी पलायन कर जाते हैं। आप सत्संगति करें और सद्‌गति प्राप्त करें।

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