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गुरु, भगवान और माता-पिता के पास देने के लिए जाएं : मुनिश्री सुधासागर जी ने धर्म और विवेक आधारित जीवन की परिभाषा प्रस्तुत की


मुनि सुधासागर जी ने अशोकनगर में गुरु भक्तों को धर्मसभा के माध्यम से जीवन की परिभाषा समझा रहे हैं। प्रवचन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और जयकारों के साथ भावविभोर वातावरण बना रहा। अशोकनगर से राजीव सिंघई मोनू, शुभम जैन की खबर…


अशोक नगर। चातुर्मासिक प्रवचनमाला के अंतर्गत रविवार को दिए गए प्रभावशाली प्रवचन में मुनि श्री सुधासागर जी महाराज ने धर्म और विवेक पर आधारित जीवन की गहरी परिभाषा प्रस्तुत की। महाराजश्री ने कहा कि गुरु, भगवान और माता-पिता के पास कुछ लेने के लिए नहीं, कुछ देने के लिए जाना चाहिए। उन्होंने समझाया कि सच्चा साधक वही है, जो कमाई को सेवा और धर्म में लगाता है। मंदिर निर्माण, चातुर्मास कलश स्थापना जैसे कार्यों में सहभागी बनना आत्मिक उन्नति का मार्ग है।

साधु का आहार नहीं, श्रावक का पुण्य है प्रधान

महाराजश्री ने कहा कि साधु यदि स्वयं का भोजन करने लगे तो भक्तों का भंडार और देश की आध्यात्मिक ऊर्जा समाप्त हो जाएगी। भगवान महावीर ने अपने शिष्यों से कहा कि आहार का उद्देश्य पेट नहीं, श्रावक के घर को पवित्र करना है। उन्होंने तीर्थंकर ऋषभदेव के उदाहरण से बताया कि गन्ने का रस लेना ‘दान’ का माध्यम था, भोग का नहीं।

धन जोड़ा, भोगा नहीं बना धौ का पेड़

महाराजश्री ने ऐसे लोगों को सावधान किया जो दिन-रात धन जोड़ते हैं, पर उसे न स्वयं के, न परिवार, न धर्म के काम लाते हैं। ऐसे लोग अगले जन्म में ‘धौ का पेड़’ बनते हैं, जिसकी जड़ें पानी की ओर नहीं, धन की ओर जाती हैं। उन्होंने चींटी का उदाहरण देते हुए कहा कि जो संग्रह करता है पर उपयोग नहीं, वह सेठ मरकर चींटी बनता है।

 पाप कार्य में धन? लक्ष्मी भी देती है शाप

भोग-विलास और पाप में लगाए गए धन पर चेताते हुए कहा गया लक्ष्मी कहेगी — मैं तुझे दानी समझकर आई थी, तू मुझे पाप में ले गया। उन्होंने जीवन की समस्याओं में भी ‘काय के लिए कमाया’ जैसे भाव न लाने की सलाह दी।

जिसके पास ज्ञान है, वह धन को धर्म में लगाए

मैं वह भाग्यवान हूँ कि खर्च के बाद भी पैसा बच रहा है। यह भाव यदि आता है, तो वही साधारण पुण्य नहीं है। महाराजश्री ने कल्पवृक्ष विधान, मंदिर निर्माण, आहार दान जैसे पुण्य कार्यों में हिस्सा लेने का आग्रह किया।

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