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अतीत की जड़ों से भविष्य की उड़ान : श्री दिगंबर जैन आचार्य संस्कृत महाविद्यालय की अमर गाथा


 ‎भारत वर्ष की सांस्कृतिक चेतना में कुछ संस्थान केवल ‎भारतीय सांस्कृतिक चेतना के विराट आकाश में केवल शिक्षण-स्थल नहीं, अपितु परंपरा के सजीव तीर्थ स्वरूप होते हैं। ऐसा ही एक अनुपम, अद्वितीय एवं गौरवगाथा से मंडित संस्थान है श्री दिगंबर जैन आचार्य संस्कृत महाविद्यालय, सांगानेर, जयपुर (राजस्थान) जो अनवरत प्रवाहित ज्ञान गंगा का अमिट स्रोत है। मुरैना/सांगानेर से पढ़िए, लेखक अंशुल जैन शास्त्री की यह प्रस्तुति मनोज जैन नायक के माध्यम से…


मुरैना/सांगानेर। ‎भारतवर्ष की सांस्कृतिक चेतना में कुछ संस्थान केवल ‎भारतीय सांस्कृतिक चेतना के विराट आकाश में केवल शिक्षण-स्थल नहीं, अपितु परंपरा के सजीव तीर्थ स्वरूप होते हैं। ऐसा ही एक अनुपम, अद्वितीय एवं गौरवगाथा से मंडित संस्थान है श्री दिगंबर जैन आचार्य संस्कृत महाविद्यालय, सांगानेर, जयपुर (राजस्थान) जो अनवरत प्रवाहित ज्ञान गंगा का अमिट स्रोत है।

वर्ष1885 का वह दासत्वग्रस्त काल, जब देश अंग्रेजी शासन की पराधीनता में जकड़ा हुआ था और भारतीय ज्ञान-परंपराएँ विशेषतः जैन दर्शन संस्कृत एवं प्राकृत का संरक्षण विलुप्ति के कगार पर था। उसी समय इस महाविद्यालय की स्थापना एक दिव्य दीप स्तंभ के रूप में हुई, जिसने अज्ञान अंधकार में ज्ञान प्रदीप प्रज्वलित किया। ‎इसी ऐतिहासिक प्रवाह के मध्य पावन रथयात्रा के शुभ अवसर पर पंडित श्री सदासुख दास जी की प्रेरणा तथा जैन समाज के निष्ठापूर्ण समर्पण से एक दिव्य बीज का रोपण हुआ। ज्ञान, अनुशासन एवं संस्कृति का वह बीज, जो कालांतर में एक विशाल वटवृक्ष के रूप में विकसित हुआ। ‎जयपुर के अधिपति महाराज सवाई मानसिंह बहादुर द्वितीय द्वारा प्रदत्त पुण्यभूमि पर “जैन पाठशाला” की स्थापना की गई। जिसने इस संस्थान को संगठित, सुदृढ़ एवं स्थायी स्वरूप प्रदान किया। यह केवल एक शिक्षण संस्था नहीं, अपितु सांस्कृतिक पुनर्जागरण का सशक्त केंद्र बनकर उदित हुई। ‎जैन समाज के उदार दान, त्याग एवं तपश्चर्या से यह महाविद्यालय निरंतर उन्नति के पथ पर अग्रसर होता रहा। इसके प्रथम अध्यक्ष धन्नालाल फौजदार ने अपनी दूरदर्शिता से इसकी आधारशिला को दृढ़ किया। तदनंतर भोरीलाल सेठी जैसे समर्पित नेतृत्व ने इसे उत्कर्ष के शिखर तक पहुँचाया। ‎वर्तमान में इस महाविद्यालय का संचालन पूर्व आईएएस अधिकारी नरेशकुमार सेठी के कुशल नेतृत्व में हो रहा है। जिनकी प्रशासनिक दक्षता एवं दूरदृष्टि इस संस्थान को निरंतर उत्कृष्टता की ओर अग्रसर कर रही है। ‎इस महाविद्यालय के प्रथम प्रधानाचार्य पंडित काशीनाथ थे, जिनकी विद्वत्ता, अनुशासनप्रियता एवं शिक्षण-निष्ठा ने इसे आदर्श शिक्षण-केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित किया। उनके पश्चात फूलचंद ने भी इस गौरवपूर्ण परंपरा को अक्षुण्ण बनाए रखा।

दुर्लभ पांडुलिपियाँ भारतीय ज्ञान-परंपरा की अमूल्य निधि 

‎वर्तमान में इस महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. अनिलकुमार जैन हैं, जिनके नेतृत्व में यह संस्थान विकास, नवोन्मेष एवं शैक्षणिक उत्कर्ष की दिशा में अग्रसर है। ‎यह संस्थान केवल ज्ञानार्जन का स्थल नहीं, अपितु संस्कार-संवर्धन का दिव्य धाम है। यहाँ पुस्तकीय ज्ञान के साथ-साथ जीवन-मूल्यों, अनुशासन एवं आत्म-विकास का समन्वित शिक्षण प्रदान किया जाता है। यही कारण है कि यहाँ से शिक्षित सहस्राधिक विद्यार्थी सम्पूर्ण भारतवर्ष में जैन दर्शन, भारतीय संस्कृति एवं मानवीय मूल्यों का आलोक प्रसारित कर रहे हैं। वर्तमान समय में यह महाविद्यालय सेंट्रल संस्कृत यूनिवर्सिटी से संबद्ध है, जो इसकी शैक्षणिक गरिमा एवं राष्ट्रीय मान्यता को सुदृढ़ करता है। ‎इस महाविद्यालय की विशिष्टता बहुआयामी है। यहाँ स्थित भव्य ऑडिटोरियम विविध सांस्कृतिक, शैक्षणिक एवं आध्यात्मिक आयोजनों का साक्षी है। साथ ही, समृद्ध पुस्तकालय में संरक्षित सैकड़ों दुर्लभ पांडुलिपियाँ भारतीय ज्ञान-परंपरा की अमूल्य निधि के रूप में संरक्षित हैं।

संस्कृत महाविद्यालय जीवंत धरोहर 

वर्ष 2002 में मुनि श्री सुधासागर जी के मार्गदर्शन एवं डॉ. शीतलचंद्र जैन के निर्देशन में इस महाविद्यालय का स्थानांतरण मनिहारों के रास्ते से सांगानेर तक किया गया, जो विकास एवं विस्तार की दिशा में एक युगांतकारी कदम सिद्ध हुआ। वर्तमान में यह महाविद्यालय संस्कृत एवं जैन जगत में एक अद्वितीय स्थान रखता है, जहाँ सैकड़ों विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। यह केवल संख्या नहीं, अपितु उस अखंड परंपरा, तप एवं श्रद्धा का प्रतीक है, जो युगों से अविच्छिन्न रूप से प्रवाहित हो रही है। ‎यदि इस महाविद्यालय को एक जीवंत धरोहर कहा जाए, तो यह सर्वथा उपयुक्त होगा। यह वह ज्ञानदीप है, जो भारतीय संस्कृति, जैन परंपरा एवं शाश्वत मूल्यों की ज्योति को अनादि-अनंत काल तक आलोकित करता रहेगा। ‎अतः ऐसे महान संस्थान का संरक्षण, संवर्धन एवं सम्मान करना प्रत्येक समाजजन का परम कर्तव्य है क्योंकि, यही हमारी सांस्कृतिक अस्मिता, परंपरा और उज्ज्वल भविष्य का आधार है।

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