25 जुलाई को देवशयनी एकादशी के साथ चातुर्मास का शुभारंभ होगा। ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद हिमांशु जैन ने बताया कि 20 नवंबर तक विवाह सहित अनेक मांगलिक कार्य सामान्यतः नहीं किए जाते तथा इस अवधि में तप, संयम, जप और साधना का विशेष महत्व रहता है। पढ़िए श्रीफल साथी मनोज जैन नायक की यह रिपोर्ट।
मुरैना। देवशयनी एकादशी के साथ शनिवार, 25 जुलाई से चातुर्मास का शुभारंभ होगा। भारतीय धर्म, ज्योतिष एवं सनातन परंपरा में देवशयनी एकादशी से लेकर देवप्रबोधिनी (देवउठनी) एकादशी तक का चार माह का काल तप, संयम, साधना एवं आत्मशुद्धि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।
25 जुलाई को रहेगा एकादशी व्रत
ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद हिमांशु जैन ने बताया कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी तिथि 24 जुलाई, शुक्रवार को प्रातः 9:13 बजे प्रारंभ होकर 25 जुलाई, शनिवार को प्रातः 11:34 बजे तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार 25 जुलाई को ही देवशयनी एकादशी का व्रत एवं पूजन किया जाएगा।
देवशयनी से देवउठनी तक चातुर्मास
उन्होंने बताया कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी के दिन भगवान श्री विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं, इसलिए इसे देवशयनी, हरिशयनी अथवा पद्मा एकादशी कहा जाता है। चार माह पश्चात कार्तिक शुक्ल एकादशी, 20 नवंबर 2026 को भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं, जिसे देवोत्थान, देवउठनी अथवा देवप्रबोधिनी एकादशी कहा जाता है।
चार माह तक मांगलिक कार्यों पर विराम
चातुर्मास की अवधि में सामान्यतः विवाह, गृहप्रवेश, नवीन भवन निर्माण का शुभारंभ, देव प्रतिष्ठा, यज्ञोपवीत संस्कार तथा अन्य प्रमुख मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। विशेष परिस्थितियों में योग्य आचार्य के मार्गदर्शन में अपवाद संभव माना गया है।
साधना और धर्म आराधना का विशेष महत्व
वर्षा ऋतु के इस काल में साधु-संत एक स्थान पर विराजमान रहकर प्रवचन, स्वाध्याय एवं साधना करते हैं। श्रद्धालुओं के लिए जप, तप, व्रत, दान, स्वाध्याय, ध्यान, सत्संग एवं आत्मचिंतन का विशेष महत्व बताया गया है।
आध्यात्मिक संदेश
ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद हिमांशु जैन ने कहा कि चातुर्मास केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आत्मसंयम, सदाचार और आध्यात्मिक उन्नति का श्रेष्ठ अवसर है। इस अवधि का सदुपयोग कर व्यक्ति अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है।













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