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जयपुर के समाजसेवी आलोक-प्रमिला शाह ने सम्मेद शिखरजी में आदिवासियों को कराया भोजन एवं वितरित किए वस्त्र : अष्टान्हिका महापर्व पर सेवा और धर्म का प्रेरक संगम


अष्टान्हिका महापर्व के अवसर पर सम्मेद शिखरजी में जयपुर के समाजसेवी आलोक-प्रमिला शाह के नेतृत्व में आदिवासियों को भोजन एवं वस्त्र वितरित किए गए। इस दौरान सिद्धचक्र महामंडल विधान में श्रद्धालुओं ने धर्म आराधना का लाभ भी प्राप्त किया। पढ़िए श्रीफल साथी उदयभान जैन की यह रिपोर्ट।


जयपुर/सम्मेद शिखरजी। जैन धर्म के सर्वोच्च शाश्वत तीर्थ क्षेत्र सम्मेद शिखरजी (मधुबन, झारखंड) में अष्टान्हिका महापर्व एवं भगवान नेमिनाथ के मोक्ष कल्याणक के पावन अवसर पर सेवा, धर्म और श्रद्धा का प्रेरक संगम देखने को मिला। बीसपंथी कोठी परिसर में जयपुर के समाजसेवी दंपति आलोक शाह एवं प्रमिला शाह के नेतृत्व में आदिवासियों को भोजन कराया गया तथा वस्त्र वितरित किए गए।

धर्म आराधना के साथ सेवा का भाव

आदिनाथ महिला मंडल की धर्म एवं प्रचार मंत्री अनिता बड़जात्या ने बताया कि जयपुर से आया धार्मिक यात्रा दल गुणायतन में परम पूज्य मुनि श्री 108 प्रमाण सागर जी महाराज के सानिध्य में आयोजित नौ दिवसीय श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान में सहभागिता कर रहा है। इसी अवसर पर संघपति आलोक-प्रमिला शाह के नेतृत्व में सेवा कार्य संपन्न किया गया।

अनिल जैन गदिया का हुआ अभिनंदन

यात्रा के दौरान कैलाश मानसरोवर की सातवीं यात्रा पूर्ण कर सम्मेद शिखरजी पहुंचे जयपुर के सम्माननीय समाजसेवी अनिल जैन गदिया (बयाना वाले) का अभिनंदन एवं स्वागत किया गया। उन्होंने परम पूज्य मुनि श्री आदर्श सागर जी महाराज से मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया।

श्रद्धालुओं की रही सहभागिता

यात्रा दल में लता सोगानी, भावना झांझरी, नीलम ठोलिया, प्रीति छाबड़ा, प्रमिला शाह, अनिता बड़जात्या, उदयभान जैन, आलोक शाह एवं अनिल जैन गदिया सहित अनेक श्रद्धालु प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।

29 जुलाई तक चलेगा महापर्व

सम्मेद शिखरजी में आयोजित नौ दिवसीय श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान 29 जुलाई तक चलेगा। श्रद्धालु प्रतिदिन सिद्धों की आराधना कर रहे हैं। 24 जुलाई को विधान में 64 अर्घ्य समर्पित कर विशेष भक्ति का आयोजन किया जाएगा।

सेवा और साधना का संदेश

अष्टान्हिका महापर्व के अवसर पर आयोजित यह सेवा कार्य धर्म आराधना के साथ मानव सेवा की प्रेरणा देता है। श्रद्धा, करुणा और परोपकार का यह संगम जैन संस्कृति के सेवा भाव को सशक्त रूप से अभिव्यक्त करता है।

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